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Friday, 11 August 2017
प्राण्व्यान्ऊदान्समान्अपान्-+++++
केवल बहुश्रुत होने के लिये , बहुत - सी जानकारी बटोरने के लिये पूछने वाले को उत्तर देना व्यर्थ होता है , खासकर सूक्ष्म विषयों के बारे में उसे बताने का कोई उपयोग नहीं क्योंकि वह उत्तर को रट - मात्र सकता है , समझ नहीं सकता , कारण कि वह साधक न होने से समझने के लिये आवश्यक यत्न ही नहीं करेगा । आजकल कई लोग शास्त्र की अनेक " गलतियों " की सूची याद रखते हैं , कोई शास्त्रवेत्ता मिले तो उससे उन्हीं के बारे में पूछते हैं । उन्हें शास्त्र श्रद्धा नहीं है अतः ऐसा नहीं कि उन्हें कोई साधना करनी है और उस गलती को देखकर वे न कर पा रहे हों , उन्हें समझा दें कि वह गलती नहीं है तो साधना करें ; उन्हें तो केवल शास्त्र गलत है यही बोलने का शोक हैं अतः एक शंका का समाधान कर भी दें तो दस की फ़हरिस्त तैयार है , जिन विषयों से उनका कोई सम्बन्ध नहीं , जिन ग्रन्थों का उन्होंने कभी अध्ययन किया नहीं उनकी दो - चार बातों के बारे में शंका करते हैं । ऐसों को समझाने का प्रयास बुद्धिमान् नहीं करते, उनकी उपेक्षा ही करते हैं । किन्तु कौशल्य ऐसा नहीं था , उपासक था , विविदिषु था , साधनापूर्वक आत्मकल्याण के लिये यत्नशील था , इसलिये महर्षि पिप्पलाद संतुष्ट हुए । सामान्य प्रश्नों का जवाब तो सामान्य विद्वान् भी दे सकते हैं , जब किसी विशेष बात को पूछा जाता है तब गुरु को अधिक प्रसन्नता होती है कि " इसका जवाब साधारण व्यक्ति नहीं दे सकता , मैं दे पा रहा हूँ और इसे समझाने लालक शिष्य मिला तो इस ज्ञान की परम्परा रह जायेगी । " अनेक विद्याएँ इसीलिये लुप्त हो जाती हैं कि योग्य शिष्य उपलब्ध नहीं होते अतः श्रेष्ठ अध्येता से अध्यापक विशेष प्रसन्न होता है ।
नारायण ! प्राण किससे पैदा होता है इसका उत्तर दिया महर्षि ने " आत्मन एष प्राणो जायते , यथेषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततम् " कि यह प्राण परमात्मा से उत्पन्न होता है । जैसे प्रकाश के आगे कोई पुरुष खड़ा हो तो उसकी परछायी पड़ती है वैसे परमात्मा पर प्राण निर्भर है । पुरुष पर छाया निर्भर है यह स्पष्ट ही है । इस उत्तर का और विस्तार से वर्णन करते हैं : परमात्मा में कोई परिवर्तन न आने पर भी उसी से प्राण उत्पन्न हुआ । जैसे अपने शरीर में किसी विकार के बिना ही शरीर की छाया पैदा हो जाती है वैसे परमात्मा से प्राण की उत्पत्ति हुई है । यदि कहा जाये कि छाया तो मिथ्या होती है अतः कारण अपरिवर्तित रहे यह उचित है , तो उत्तर है कि प्राण भी आत्मा पर कल्पित ही है । छाया पड़ने के लिये दर्पण , प्रकाश आदि उपाधियों की तरह आत्मा की उपाधि माया है जिससे प्राणरूप परछायी पड़ती है ।
नारायण ! परमात्मा अपने में से ही प्राण को पैदा करता है , वही प्राण का निमित्त और उपादान दोनों है । कारण विकारी ही हो यह नियम नहीं क्योंकि जहाँ कार्य मिथ्या होता है वहाँ कारण निर्विकार रहता है यह लोकसिद्ध है । उपादान और निमित्त दोनों में कुछ - न - कुछ परिवर्तन के बिना सत्य कार्य नहीं पैदा होता लेकिन असत्य कार्य पैदा हो इसके लिये कोई परिवर्तन नहीं चाहिये । इसके लिये अनुभवसिद्ध उदाहरण छाया का दिया । शरीर की छाया शरीर से ही पैदा होती है पर उसके पैदा होने से शरीर में कोई परिवर्तन नहीं होता । व्यावहारिकता को स्पष्ट करने के लिये छाया का दृष्टान्त है। रज्जुसर्प की तरह छाया का बाध नहीं होता लेकिन उसकी सत्ता शरीर की सत्ता के अधीन ही होने से उसका मिथ्यात्व समझ आ जाता है । छाया कुछ नहीं है यह नहीं कह सकते , वह कार्यकारी है जैसा कि ग्रहणादि में स्पष्ट है या प्रतिबिम्बरूप छाया में रोज अनुभव में आता है । इसी प्रकार प्राण भी व्यावहारिक है , कार्यकारी है फिर भी मिथ्या ही है । प्राण सौपाधिक भ्रान्ति है , माया उपाधि के रहते प्राणरूप भ्रम बना रहता है । अतः प्राण किससे पैदा होता है ? इसका उत्तर है कि मायारूप उपाधि रहते परमात्मा से ही प्राण पैदा होता है किन्तु प्राण और उसका पैदा होना दोनों मिथ्या हैं क्योंकि जिस उपाधि से यह पैदा होता है वही मिथ्या है ।
नारायण ! तृतीय प्रश्न का दूसरा भाग था कि प्राण शरीर में क्यों आता है । इसका श्रुति में जवाब है " मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे " अर्थात् मन द्वारा संकल्पादिपूर्वक किये कर्म के कारण प्राण शरीर में आता है । इसे स्पष्ट करते हुए बताते हैं : मन द्वारा पूर्व कल्प में किया जो कर्म है उसी के कारण प्राण स्थूल शरीर में आता हैं । कल्पारम्भ में प्राण स्थूल देह में आता है तो पिछले कल्प के कर्मों के ही कारण । तदनन्तर तो इस कल्प के भी पूर्व जन्मों के कर्म अगले जन्मों के प्रति कारण बनते रहते हैं । किं च प्रथम शरीरी अर्थात् हिरण्यगर्भ का तो पूर्वकल्प के कर्मवश ही इस कल्प में जन्म होता है , उसकी दृष्टि से पूर्वकल्प का कथन किया गया । कर्म संकल्पादिपूर्वक किया जाता है अतः मन का नाम लिया । कर्म के दौरान भी मन की सावधानी चाहिये । जो कर्म बिना मन के , असावधानी से , अनजान में होते हैं , उनका फल भोगना तो पड़ता है लेकिन शरीर ग्रहण कराने की सामर्थ्य उनमें नहीं होती । शरीर ग्रहण तो समझ - बूझकर किया कर्म कराते हैं , तदन्तर अनजान में किये कर्म भी फल देते हैं । द्वितीय भाग का उत्तर स्पष्ट हो गया कि मन से किये कर्म के कारण प्राण शरीर में आता है । कौन किस योनि में पैदा होगा इसके निर्णय में मानस कर्मरूप उपासना का प्राधान्य भी माना गया है , इऱिये भी मन का उल्लेख संगत है ।
नारायण ! प्रश्न का तीसरा भाग था कि प्राण को बाँट कर शरीर में कैसे रहता है ? इसके उत्तर में महर्षि पिप्पलाद ने कहा कि जैसे सम्राट् विभिन्न स्थानों पर अधिकारी नियुक्त कर देता है वैसे प्राण ने शरीर के विभिन्न स्थलों पर अलग - अलग कार्यों के लिये अपनी वृत्तियाँ नियुक्त कर दी हैं । यही उसका बैठकर रहना है । इस उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करते हैं : जिस प्रकार सम्राट् अपने विभिन्न अधिकारियों को तत्तत् गाँवों में नियुक्त कर देता है उसी प्रकार जहाँ - जहाँ जिस कार्य की आवश्यकता है उसे करने के लिये वहाँ - वहाँ अपनी वृत्तियों को नियुक्त कर देता है । मल - मूत्र को शरीर से बाहर निकालने के लिये " अपानवृत्ति " को नीचे { गुदा में } में स्थापित करता है । प्राण नामक वृत्ति साँस चलाते हुए मुँह व नासिका में स्थित है । खाये हुए अन्न को सारे शरीर में समान रूप से फैला दे इस प्रयोजन से " समान " नामक वृत्ति शरीर के बीच में अर्थात् नाभि में स्थापित है । सिर के सात छेदों को भी अन्न से पोषित करता है अतः उनके भेद से समान सात प्रकार का हो जाता है ।
नारायण ! सारे राज्य पर शासन चलाने के लिये सर्वत्र राजशक्ति उपस्थित होनी आवश्यक है । अधिकारियों के माध्यम से राजा की शक्ति गाँव - गाँव में मौजूद होती है । ऐसे ही शरीर में सर्वत्र प्राण को उपस्थित रहना है अतः वह अपनी वृत्तियाँ नियुक्त कर देता है । राजा और अधिकारी व्यक्ति विभिन्न होते हैं , ऐसे पाँचों वृत्तियाँ प्राण से पृथक् नहीं है इतना दृष्टान्त से अन्तर है किन्तु जैसे एक ही राजशक्ति सर्वत्र है वैसे एक ही प्राणशक्ति सर्वत्र है । अथवा जैसे एक हाथ से " गेयर " सम्भालते हैं , दूसरे से " स्टियरिंग " पकड़ते हैं , एक पैर " क्लच " पर रखते हैं , दूसरा " ऐक्सिलरेटर " पर रखते हैं यों अलग - अलग कार्यों के लिये अपने देहावयवों को काम में लेते हैं वैसे प्राण ने अपनी ही वृत्तियाँ तत्तत् कार्य में नियुक्त की हैं यह समझ सकते हैं । सभी वृत्तियों पर प्राण का नियन्त्रण एक जैसा रहता है । श्वास चलाने वाली वृत्ति का नाम भी प्राण है किन्तु है वह एक वृत्ति ही , उसे वृत्तिमान् प्राण जिसकी पाँचों वृत्तियाँ है वह नहीं समझ लेना चाहिये । श्वास कर्म अत्यन्त प्रधान होने से उसकी संपादक वृत्ति प्राण कही जाती है । समान वृत्ति शरीर में आवश्यकतानुसार अन्नादि के पोषक तत्त्वों को फैलाती है । होम में आहुति डालते हैं तो ज्वाला निकलती है , ऐसे ही जाठराग्नि में भोजन की आहुति डालते हैं तो ज्वाला लपटें निकलती हैं , वे ही सिर के सात छिद्रों में प्रकट हैं । अग्नि की सात लपटें मुण्डक उपनिषद् में भी कही हैं । सिर के सात छेद हैं - दो कान , दो आँखें , दो नासिका - छिद्र और मुख । इन्हें शीर्षण्य अर्थात सिर में होने वाले प्राण भी कहते हैं । " समान " ही इनका पोषक है , वही सात ज्वालाओं का रूप लेकर इन तक आवश्यक आहार पहुँचाता है । गोलकभेद सात हैं , गोलकों की पुष्टि की दृष्टि से ही " समान " को सात भेदों वाला कहा गया है ।
नारायण ! " व्यान " नाडियों में व्याप्त रहता है अतः उपनिषद् ने यहाँ नाडी - संख्या बताकर उन नाड़ियों को " व्यान " का नियत स्थान कहा है
नारायण ! प्राण किससे पैदा होता है इसका उत्तर दिया महर्षि ने " आत्मन एष प्राणो जायते , यथेषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततम् " कि यह प्राण परमात्मा से उत्पन्न होता है । जैसे प्रकाश के आगे कोई पुरुष खड़ा हो तो उसकी परछायी पड़ती है वैसे परमात्मा पर प्राण निर्भर है । पुरुष पर छाया निर्भर है यह स्पष्ट ही है । इस उत्तर का और विस्तार से वर्णन करते हैं : परमात्मा में कोई परिवर्तन न आने पर भी उसी से प्राण उत्पन्न हुआ । जैसे अपने शरीर में किसी विकार के बिना ही शरीर की छाया पैदा हो जाती है वैसे परमात्मा से प्राण की उत्पत्ति हुई है । यदि कहा जाये कि छाया तो मिथ्या होती है अतः कारण अपरिवर्तित रहे यह उचित है , तो उत्तर है कि प्राण भी आत्मा पर कल्पित ही है । छाया पड़ने के लिये दर्पण , प्रकाश आदि उपाधियों की तरह आत्मा की उपाधि माया है जिससे प्राणरूप परछायी पड़ती है ।
नारायण ! परमात्मा अपने में से ही प्राण को पैदा करता है , वही प्राण का निमित्त और उपादान दोनों है । कारण विकारी ही हो यह नियम नहीं क्योंकि जहाँ कार्य मिथ्या होता है वहाँ कारण निर्विकार रहता है यह लोकसिद्ध है । उपादान और निमित्त दोनों में कुछ - न - कुछ परिवर्तन के बिना सत्य कार्य नहीं पैदा होता लेकिन असत्य कार्य पैदा हो इसके लिये कोई परिवर्तन नहीं चाहिये । इसके लिये अनुभवसिद्ध उदाहरण छाया का दिया । शरीर की छाया शरीर से ही पैदा होती है पर उसके पैदा होने से शरीर में कोई परिवर्तन नहीं होता । व्यावहारिकता को स्पष्ट करने के लिये छाया का दृष्टान्त है। रज्जुसर्प की तरह छाया का बाध नहीं होता लेकिन उसकी सत्ता शरीर की सत्ता के अधीन ही होने से उसका मिथ्यात्व समझ आ जाता है । छाया कुछ नहीं है यह नहीं कह सकते , वह कार्यकारी है जैसा कि ग्रहणादि में स्पष्ट है या प्रतिबिम्बरूप छाया में रोज अनुभव में आता है । इसी प्रकार प्राण भी व्यावहारिक है , कार्यकारी है फिर भी मिथ्या ही है । प्राण सौपाधिक भ्रान्ति है , माया उपाधि के रहते प्राणरूप भ्रम बना रहता है । अतः प्राण किससे पैदा होता है ? इसका उत्तर है कि मायारूप उपाधि रहते परमात्मा से ही प्राण पैदा होता है किन्तु प्राण और उसका पैदा होना दोनों मिथ्या हैं क्योंकि जिस उपाधि से यह पैदा होता है वही मिथ्या है ।
नारायण ! तृतीय प्रश्न का दूसरा भाग था कि प्राण शरीर में क्यों आता है । इसका श्रुति में जवाब है " मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे " अर्थात् मन द्वारा संकल्पादिपूर्वक किये कर्म के कारण प्राण शरीर में आता है । इसे स्पष्ट करते हुए बताते हैं : मन द्वारा पूर्व कल्प में किया जो कर्म है उसी के कारण प्राण स्थूल शरीर में आता हैं । कल्पारम्भ में प्राण स्थूल देह में आता है तो पिछले कल्प के कर्मों के ही कारण । तदनन्तर तो इस कल्प के भी पूर्व जन्मों के कर्म अगले जन्मों के प्रति कारण बनते रहते हैं । किं च प्रथम शरीरी अर्थात् हिरण्यगर्भ का तो पूर्वकल्प के कर्मवश ही इस कल्प में जन्म होता है , उसकी दृष्टि से पूर्वकल्प का कथन किया गया । कर्म संकल्पादिपूर्वक किया जाता है अतः मन का नाम लिया । कर्म के दौरान भी मन की सावधानी चाहिये । जो कर्म बिना मन के , असावधानी से , अनजान में होते हैं , उनका फल भोगना तो पड़ता है लेकिन शरीर ग्रहण कराने की सामर्थ्य उनमें नहीं होती । शरीर ग्रहण तो समझ - बूझकर किया कर्म कराते हैं , तदन्तर अनजान में किये कर्म भी फल देते हैं । द्वितीय भाग का उत्तर स्पष्ट हो गया कि मन से किये कर्म के कारण प्राण शरीर में आता है । कौन किस योनि में पैदा होगा इसके निर्णय में मानस कर्मरूप उपासना का प्राधान्य भी माना गया है , इऱिये भी मन का उल्लेख संगत है ।
नारायण ! प्रश्न का तीसरा भाग था कि प्राण को बाँट कर शरीर में कैसे रहता है ? इसके उत्तर में महर्षि पिप्पलाद ने कहा कि जैसे सम्राट् विभिन्न स्थानों पर अधिकारी नियुक्त कर देता है वैसे प्राण ने शरीर के विभिन्न स्थलों पर अलग - अलग कार्यों के लिये अपनी वृत्तियाँ नियुक्त कर दी हैं । यही उसका बैठकर रहना है । इस उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करते हैं : जिस प्रकार सम्राट् अपने विभिन्न अधिकारियों को तत्तत् गाँवों में नियुक्त कर देता है उसी प्रकार जहाँ - जहाँ जिस कार्य की आवश्यकता है उसे करने के लिये वहाँ - वहाँ अपनी वृत्तियों को नियुक्त कर देता है । मल - मूत्र को शरीर से बाहर निकालने के लिये " अपानवृत्ति " को नीचे { गुदा में } में स्थापित करता है । प्राण नामक वृत्ति साँस चलाते हुए मुँह व नासिका में स्थित है । खाये हुए अन्न को सारे शरीर में समान रूप से फैला दे इस प्रयोजन से " समान " नामक वृत्ति शरीर के बीच में अर्थात् नाभि में स्थापित है । सिर के सात छेदों को भी अन्न से पोषित करता है अतः उनके भेद से समान सात प्रकार का हो जाता है ।
नारायण ! सारे राज्य पर शासन चलाने के लिये सर्वत्र राजशक्ति उपस्थित होनी आवश्यक है । अधिकारियों के माध्यम से राजा की शक्ति गाँव - गाँव में मौजूद होती है । ऐसे ही शरीर में सर्वत्र प्राण को उपस्थित रहना है अतः वह अपनी वृत्तियाँ नियुक्त कर देता है । राजा और अधिकारी व्यक्ति विभिन्न होते हैं , ऐसे पाँचों वृत्तियाँ प्राण से पृथक् नहीं है इतना दृष्टान्त से अन्तर है किन्तु जैसे एक ही राजशक्ति सर्वत्र है वैसे एक ही प्राणशक्ति सर्वत्र है । अथवा जैसे एक हाथ से " गेयर " सम्भालते हैं , दूसरे से " स्टियरिंग " पकड़ते हैं , एक पैर " क्लच " पर रखते हैं , दूसरा " ऐक्सिलरेटर " पर रखते हैं यों अलग - अलग कार्यों के लिये अपने देहावयवों को काम में लेते हैं वैसे प्राण ने अपनी ही वृत्तियाँ तत्तत् कार्य में नियुक्त की हैं यह समझ सकते हैं । सभी वृत्तियों पर प्राण का नियन्त्रण एक जैसा रहता है । श्वास चलाने वाली वृत्ति का नाम भी प्राण है किन्तु है वह एक वृत्ति ही , उसे वृत्तिमान् प्राण जिसकी पाँचों वृत्तियाँ है वह नहीं समझ लेना चाहिये । श्वास कर्म अत्यन्त प्रधान होने से उसकी संपादक वृत्ति प्राण कही जाती है । समान वृत्ति शरीर में आवश्यकतानुसार अन्नादि के पोषक तत्त्वों को फैलाती है । होम में आहुति डालते हैं तो ज्वाला निकलती है , ऐसे ही जाठराग्नि में भोजन की आहुति डालते हैं तो ज्वाला लपटें निकलती हैं , वे ही सिर के सात छिद्रों में प्रकट हैं । अग्नि की सात लपटें मुण्डक उपनिषद् में भी कही हैं । सिर के सात छेद हैं - दो कान , दो आँखें , दो नासिका - छिद्र और मुख । इन्हें शीर्षण्य अर्थात सिर में होने वाले प्राण भी कहते हैं । " समान " ही इनका पोषक है , वही सात ज्वालाओं का रूप लेकर इन तक आवश्यक आहार पहुँचाता है । गोलकभेद सात हैं , गोलकों की पुष्टि की दृष्टि से ही " समान " को सात भेदों वाला कहा गया है ।
नारायण ! " व्यान " नाडियों में व्याप्त रहता है अतः उपनिषद् ने यहाँ नाडी - संख्या बताकर उन नाड़ियों को " व्यान " का नियत स्थान कहा है
Saturday, 5 August 2017
आदिशंकराचार्य +++
तप से चित्तभूमि तैयार होने पर श्रवण से तत्त्वबोध होता है जिसे योग से दृढ करने के लिये निर्विकल्प समाधि में स्थित रहा जाता है । द्वैताकार वृत्ति का अनुदय और अद्वैताकार वृत्ति की स्थिरता यहाँ समाधि है जिससे तत्त्वज्ञान हो जाता है , अज्ञान मिटा देता है । फिर प्रारब्धवश जब व्युत्थान होता है अर्थात् समाधि टूटती है , द्वैताकार वृत्ति बनती है तब भी विद्वान् को अद्वैत की याद हरदम कायम रहती है । द्वैत को मिथ्या जानने से उसकी प्रतीति के बावजूद वह याद रखता है कि सत्य अद्वैत ब्रह्म ही है । इसका चिह्न है कि वह ब्रह्म की स्तुति करता रहता है , जो कुछ कहता है वह परमात्मा की प्रशंसा ही है । तैत्तिरीय उपनिषद् में भी तत्त्वज्ञान के बाद अपनी सर्वरूपता का गान करते हुए विद्वान् रहता है यह बताया । गान या स्तवन यह द्योतित करता है कि उसे सर्वात्मा का स्मरण बना हुआ है , भेदानुभव ने अभेदानुभूव को अभिभूत नहीं कर लिया । परमात्मा को सर्वरूप कहना स्तुति है , यथावत् स्थिति नहीं क्योंकि सर्व कुछ है यह मानकर परमात्मा को तद्रूप कहा जा रहा है । वास्तव में तो सर्व अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों व वस्तुओं का समुदाय है ही नहीं कि परमात्मा को सर्वरूप कहा जाये । व्युत्थान दशा में सर्व प्रतीत होता है तो उसे परमात्मा पर ही आरोपित जानते हुए विद्वान् कहता है कि वही इन सब रूपों में है अतः यह स्तुति है । हर चीज को परमात्म दृष्टि से देखें तो परमात्मा को कभी भूल नहीं पायेंगे । गाली को भी दुर्वचन के रूप में न ग्रहण कर उसके प्रत्येक अक्षर की परमात्मबोधकता के आधार पर परमात्मा के ज्ञापक के रूप में ग्रहण करने की आदत पड़ जाये तब सदा शिवदृष्टि कायम रहेगी । गाली को दुर्वचन मानने से बहिर्मुखी विचार - प्रवाह प्रारम्भ होकर दुःख , द्वेष आदि बढ़ेगा । पुराणों में यही स्पष्ट करने के लिये ऋषियों के वर्णन आये हैं कि दीर्घ समाधि के बाद भी यदि क्षणभर को भी ब्रह्म को भूले तो शाप - कोप आदि से अपना तप क्षीण कर गये । संसार को सत्य समझने वाला संसार में ही फायदा - नुकसान देखता है जबकि उसे मिथ्या जानने वाला आत्मस्थिति को ही फायदा और उसके विचलन को ही नुकसान देखता है । इसीलिये अध्यात्म साधक में वैराग्य की अत्यधिक आवश्यकता है । विद्वान् स्वभावतः स्तुति करता है , मुमुक्षु यत्नतः ऐसा करे । सर्वरूप परमात्मा है इसे द्योतित करने वाले अनेक स्तोत्रादि वेद , पुराण आदि उपलब्ध हैं , उनका सतत अर्थ - चिन्तन सहित आवर्तन भी अत्यन्त सहायक हो जाता है क्योंकि विचार को दिशा - निर्देश देता है । प्रकृत उपनिषत् में " कुत्स मुनि कृत स्तुति " आयी है जिसमें ब्रह्मा , विष्णु आदि सब रूपों वाला परमेश्वर को कहा है । स्वयं में जब रचयितृत्व , पालकत्व , नाशकत्व प्रतीत हो तब विचार करना चाहिये कि ये ब्रह्मा , विष्णु , रुद्र के ही कार्य हैं , परमेश्वर ही उन रूपों से ये कार्य सम्पन्न कर रहा है , मैं इसमें उपकरण - मात्र हूँ । इस तरह दृश्य और द्रष्टा दोनों परमात्मरूप हैं यह अनुसन्धान बनाये रखना साधक के लिये उपयोगी है । इससे कर्तृत्व भोक्तृत्व शिथिल पड़ता जाता है । द्वैत के संस्कार अनादि काल से पड़े हैं , अतिगहन हैं , अतः उन्हें दूर करने के लिये प्रयत्न अत्यधिक चाहिये । कपड़ा जितना ज्यादा गंदा हो उसे साफ करने के लिये उतनी ही ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है । अभ्यास की अत एव आश्यकता है , केवल समझ लेना पर्याप्त नहीं , उसे प्रतिक्षण दोहराते रहना , समाधि में वही बोध रखना, व्युत्थान में वैसी ही दृष्टि बनाते रहना पड़ता है तभी धीरे - धीरे द्वैतवासना दूर होकर ज्ञान दूढ हो सकता है । भगवान् शङ्करचार्य जी कृत " उपदेशसाहस्री " के परिसंख्यान प्रकरण आदि में इसके लिये स्पष्ट निर्देश उपलब्ध है । योग अर्थात् निर्विकल्प समाधि में अद्वैत का सुस्पष्ट अनुभव हो जाये , व्युत्थान काल में दीर्घ अभ्यास से द्वैत - वासनाओं का क्षय हो जाये तो " मैं जीव हूँ " यह भ्रम सदा के लिये समाप्त हो जाता है । भूतकार्य शरीरों में मैं - बुद्धि ही जीवभाव है , अपनी पूर्ण व्यापकता के अनुभव से वह परिच्छिन्न अभिमान निवृत्त हो जाता है । स्वयं परमेश्वर ही जब भूत - भौतिक आकारों में प्रतीयमान तथा वही देहों में प्रविष्टरूप से प्रतीयमान है तब भेद की कोई सम्भावना रह नहीं जाती । दृश्य - द्रष्टा दोनों मिथ्या हैं , दोनों का अधिष्ठान चिन्मात्र ही सत्य है , वही प्रत्यक्तम वस्तु है । सत्य के साक्षात्कार से जब जीवभाव मिट जाता है तब वास्तविक सत्य ही बचेगा इसमें क्या संदेह ! बोद्धों के विज्ञानवाद का इतना ही संदेश हो कि प्रमाता मिथ्या है तो बात गलत नहीं है किन्तु वे सत्य चिद्रूप अधिष्ठान को नकारते हैं इसलिये उनका मत गलत हो जाता है । किसी सत्य के सहारे ही दूसरे को असत्य समझ सकते हैं , यदि कुछ सत्य है ही नहीं तो " सब सत्य है " व " सब असत्य है " का कोई अन्तर ही नहीं रह जाता । निरधिष्ठान भ्रम मानने के अंधविश्वास से ही बोद्धों का मत खोखला बन पड़ा है । सांख्यवाद यद्यपि आत्मा को अनात्मा से पृथक कर दिखा देता है तथापि प्रकृति को , जड प्रपञ्च को सत्य मानकर द्वैतरूप भयहेतु को कायम रखकर मोक्ष को असम्भव कर देता है । अतः वेदान्त स्पष्ट करता है कि द्वैतबुद्धि का उपमर्दन कर , जीवताभ्रम छोड़कर , परमात्मभाव में स्थित रहना ही परम पुरुषार्थ है ।
नारायण ! स्तुति के बाद उपनिषत् में समझाया है कि एक ही चिदात्मा सर्वाकारों में है , तत्त्व का कोई भेद नहीं है " तमो वा इदमग्र आसीद् एकम्। तत् परे स्यात् । तत् परेणेरितं विषमत्वं प्रयाति । एतद्रूपं वै रजः । तद् रजः खल्वीरितं विषमत्वं प्रयाति । एतद्वै सत्त्वस्य रूपम् । तत् सत्त्वमेवेरितं रसः सम्प्रास्रवत् । सोंऽशोऽयं यश्चेतामात्रः प्रतिपुरुषः क्षेत्रज्ञः सङ्कल्पाऽध्यवसायाभिमानलिङ्गः प्रजापतिर्विश्वेत्यस्य प्रामुक्ता एतास्तनवः। " अर्थात् जो कुछ भी इदं - बुद्धिगम्य है वह उत्पत्ति से पूर्व तम अर्थात् मायारूप कारणात्मा ही था , उस स्थिति में अकेला तम था , अभिव्यक्त हुए नाम - रूप नहीं थे । वह तम पर अर्थात् परब्रह्म पर अध्यस्त था , अचेतन सदा चित्पराधीन ही होता है । वह परमात्मा ही तम , माया को प्रेरित करता है । जैसे जल बीज में प्रवेश कर बीज को अंकुरित करता है ऐसे चैतन्य आभासरूप से माया में प्रवेश कर उसे जगदाकार में अंकुरित करता है । परमात्मा से प्रेरित हुआ तम साम्यावस्था छोड़कर कार्योन्मुख हो जाता है , यही रज आधिक्य की अवस्था है । पुनः परमात्मप्रेरणा से जब उस दशा में भी विषमता आती है तब सत्त्वाधिक्य की अवस्था होती है। परमेश्वर प्रेरित सत्त्व के आधिक्य में रस अर्थात् चिदानन्दरूप प्रकाश प्रकट होता है । सत्त्व में प्रकट हुआ चेतन ही पुरुष की प्रतिकृति है , उसे ही क्षेत्रज्ञ कहते हैं । संकल्प , निश्चय , अभिमान आदि उस क्षेत्रज्ञ के चिह्न हैं । संकल्पादि ही व्यावहारिक चेतन का अनुमान कराते हैं , जड शरीर से अन्य चेतन को युक्तियुक्त सिद्ध करते हैं । सत्त्व में पड़ा चित्प्रतिबिम्ब ही विश्व - विराट् आदि व्यष्टि - समष्टि शरीर ग्रहण करता है । प्रतिबिम्ब सत्त्व के कारण ही ग्रहण होने पर भी रजस् - तमस् के साहचर्यवश उपाधि में विशेषताएँ आ जाती हैं जैसे तम आधिक्य से रुद्र - उपाधि , रज आधिक्य से ब्रह्मा - उपाधि , एवं सत्त्वाधिक्य से विष्णु - उपाधि बन जाने से इनमें प्रतिबिम्बित रुद्रादि देव हो जाते है । जितने भी विविध चेतन प्रतीयमान हैं सब इसी तरह विभिन्न हुए हैं , बिम्ब चेतन अखण्ड ही है ।
नारायण ! स्तुति के बाद उपनिषत् में समझाया है कि एक ही चिदात्मा सर्वाकारों में है , तत्त्व का कोई भेद नहीं है " तमो वा इदमग्र आसीद् एकम्। तत् परे स्यात् । तत् परेणेरितं विषमत्वं प्रयाति । एतद्रूपं वै रजः । तद् रजः खल्वीरितं विषमत्वं प्रयाति । एतद्वै सत्त्वस्य रूपम् । तत् सत्त्वमेवेरितं रसः सम्प्रास्रवत् । सोंऽशोऽयं यश्चेतामात्रः प्रतिपुरुषः क्षेत्रज्ञः सङ्कल्पाऽध्यवसायाभिमानलिङ्गः प्रजापतिर्विश्वेत्यस्य प्रामुक्ता एतास्तनवः। " अर्थात् जो कुछ भी इदं - बुद्धिगम्य है वह उत्पत्ति से पूर्व तम अर्थात् मायारूप कारणात्मा ही था , उस स्थिति में अकेला तम था , अभिव्यक्त हुए नाम - रूप नहीं थे । वह तम पर अर्थात् परब्रह्म पर अध्यस्त था , अचेतन सदा चित्पराधीन ही होता है । वह परमात्मा ही तम , माया को प्रेरित करता है । जैसे जल बीज में प्रवेश कर बीज को अंकुरित करता है ऐसे चैतन्य आभासरूप से माया में प्रवेश कर उसे जगदाकार में अंकुरित करता है । परमात्मा से प्रेरित हुआ तम साम्यावस्था छोड़कर कार्योन्मुख हो जाता है , यही रज आधिक्य की अवस्था है । पुनः परमात्मप्रेरणा से जब उस दशा में भी विषमता आती है तब सत्त्वाधिक्य की अवस्था होती है। परमेश्वर प्रेरित सत्त्व के आधिक्य में रस अर्थात् चिदानन्दरूप प्रकाश प्रकट होता है । सत्त्व में प्रकट हुआ चेतन ही पुरुष की प्रतिकृति है , उसे ही क्षेत्रज्ञ कहते हैं । संकल्प , निश्चय , अभिमान आदि उस क्षेत्रज्ञ के चिह्न हैं । संकल्पादि ही व्यावहारिक चेतन का अनुमान कराते हैं , जड शरीर से अन्य चेतन को युक्तियुक्त सिद्ध करते हैं । सत्त्व में पड़ा चित्प्रतिबिम्ब ही विश्व - विराट् आदि व्यष्टि - समष्टि शरीर ग्रहण करता है । प्रतिबिम्ब सत्त्व के कारण ही ग्रहण होने पर भी रजस् - तमस् के साहचर्यवश उपाधि में विशेषताएँ आ जाती हैं जैसे तम आधिक्य से रुद्र - उपाधि , रज आधिक्य से ब्रह्मा - उपाधि , एवं सत्त्वाधिक्य से विष्णु - उपाधि बन जाने से इनमें प्रतिबिम्बित रुद्रादि देव हो जाते है । जितने भी विविध चेतन प्रतीयमान हैं सब इसी तरह विभिन्न हुए हैं , बिम्ब चेतन अखण्ड ही है ।
Wednesday, 26 July 2017
आत्मरचना_+++
Swamishishuvidehanand Tiw: Swamishishuvidehanand Tiw: ता २,६/७/२०१७-ऊत्तररात्री
०१"४८--( २५"४८)
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपीठ ,संस्थापक अध्यक्ष
हम स्वामि शिशुविदेहानंद सरस्वती तिवारी महाराज ' अग्निहोत्रितिवारी'
तिवारी का बाडा
कारंजालाड (दत्त) 444105 जिला वाशिम महाराष्ट्र
माॅ मीराबाई ह तिवारी द्वारा आयोजित कार्यक्रम सव्वाकरोड मिट्टी के शिवलिंग निर्माण में विश्व के अनेकानेक व्यक्ति
ग्लोबल वार्मिंग एवं भूमंडलीय औष्णिकरण पर सन 1994/2005/ से कार्य अध्यात्मिक पद्धति से शुरू है
पहलाचरण एकतालिसलाख ग्यारह हजार पाचसौ का पुर्ण हो चूका,
अब
दुसराचरण एकसष्टलाख ग्यारहहजार मिट्टि के शिवलिंग निर्माण का शुरू है ,
।। अथातों वृक्षसंवर्धन जिद्न्यासा।।
एकसठलाख ग्यारहहजार शिवलिंगम् का अभिषेकम् पुजनम्
दुसराचरण पूर्ण हो गया है।
माँ
मीराबाई ह तिवारि द्वारा
आयोजित कार्यक्रम सव्वासौकरोड मिट्टी के शिवलिंगम् निर्माण
एकसष्ठ लाख ग्यारहहजार नौ सौ (६१०००००"११हजार नौ सौ )
।। अथातों वैदिक वृक्ष जिद्न्यासा ।।
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपिठ, संस्थापक अध्यक्ष स्वामिशिशुविदेहानन्द'स्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज कारंजालाड(दत्त)४४४१०५ जिला वाशिम के
माँ मिराबाई हरीकिसन तिवारि के मार्गदर्शन में ,
शक्तीपिठ में सब वृक्षसंवर्धन के कार्य होते है।
।। अथातों वृक्षसंवर्धन जिद्न्यासा ।।
,माँ मिराबाई ह तिवारि, उन पौधो का अनावरण् करती हुई ,इस अवसर पर हम
भी उपस्थित होकर उन पौधो को गोद मे लिया।
।। अथातों भक्त जिद्न्यासा ।।
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपिठ ,संस्थापक अध्यक्ष स्वामिशिशुविदेहानन्दस्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज , के तत्वावधान में
विशाल
पौधरोपण एवं
षोषखड्डा = रेनवाटर हार्वेस्टिंग , ,ओर प्रीय मित्रों, अनुयायियों ,और सदस्यों को हम
स्वामिशिशुविदेहानन्दस्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज
आवाहन करते है ..
शिवलिंगम् निर्माण में शामिल हुए।
Swamishishuvidehanand TiwariMaharaJ
SwamishishuvidehanandSwamishishusatyaVidehanand Sarswati
09921700260/09503857973---
।। अथातों आत्मरचना जिद्न्यासा।।
एक शिष्य को जानकारी चाहिए थी कि हम ( मै स्वामिशिशुविदेहानन्दस्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज ) कैसे जिवन कि कहानी आपकी ,हमने कहा एकदम शाँर्ट मे बताता हूँ ,वैसे तो बहुत बड़ि है ,लेकिन एकदम शाँर्ट मे बता ना चाहता हूँ क्योकी कुछ ऐसी घटनाऐ और रूग्जुव है जिसे आपकी बुद्धी स्विकार नही करेगी या वहातक नही पहूँचेगी.......
27/7, 01:35] Swamishishuvidehanand TiwariMaharsJ'SwamiSatyaVidehanandSarswati
मि
जन्मताचं मला वेदपाठ् येऊलागले
१२ वर्ष पर्यन्त सगले वेद,वेदान्ग ,पुराण, पाठ्झाले ,
नन्तर
लिला साठी जगाला दाखवायचे नव्हते की मी सिद्ध
अवस्थेत आहे म्हणुन विभिन्न लिला केल्या
१५ वर्षि समाधि साधली
सदसदगुरुदेव तर १० व्या वर्षिच भेटले त्यांनि त्याचवयात मन्त्रदीक्षा,स्वप्न दीक्षा,आणि ,वैभवदीक्षासहित ,ब्रम्हदण्ड दीला ( त्रिदण्डि संन्यासी म्हणुन घड़वले मला ) नन्तर पाच दण्ड़
दीक्षा दीली ,आणि माझ सिद्धत्व परिक्षा घेतल्यातं त्यात मि
चौदावेळा, अन्तरिक्षांत जाऊन आलो अन विभिन्न सोलरमण्डलातली
माती दगड़, अन धातू सदसदगुरुदेव ना आणून दाखवले ।म्हणून त्यांनीमला
सौरमण्डलेश्वर
आणि
नऊ (९), श्रिश्रिश्रिश्रिश्रिश्रिश्रिश्रिश्रि
,ची
उपाधिप्रदान
केली
मग
मी
२२वर्षि त्यांच्याच आज्ञेने
महामहतसमाधियोग
सिद्ध करून दाखवला ,त्यात जन्ममरण हे २७ हातावर उमटते ,ते पाहून
त्यांनीमला
१००००८
आणि
१०००००००००८
ची
पदवी
प्रदानकेली
या
१= महतत्व ,फिजीकल बाँडि।
०=यृक्ष्र्र् तत्व ,काँस्मिकबाँडी ।
०=ञ्र्र्र्र् तत्व ,आँराएक्सिसझोनदिक्षा बाँडि।
०=ङ्र्र्र्र्र् तत्व , स्पिरिच्युअलबाँडी ।
०= ह्र्र्र्र् तत्व , एस्ट्राँलबाँडी ।
०=ह्मौत्भिर्र्र तत्व , ह्लीक्ष्झुत्र्थ्छ्इ्ष्चित्ताभीगिणवृताष्व्र्त्रा बाँडि।
०= ज्ञ्र्र्रतत्व , ञब्रम्ह बाँडि ।
०=द्भ्र्र्त्व्र्द्ध्द्तत्व , ह्मूङीघृर्र्र् बाँडि।
०=<ब्र्र्र्तत्व ,त्न्र्र्र्त्र्र्बाँडि ।
८=स्र्र्र्तत्व , युनिवर्सल बाँडि
आणि
गन्न्न्न्न्ध्त्व
श्रेणि
प्रदानकेलि।
२८ वर्षि मि बेग्दुरकलाँ गावात
परकामयाप्रवेश ,महाभुतसिद्धि,च प्रक्टिकल जनतेलां दाखवल ,
आणि जवळपास् ४९९ लोकांचे ,महतरोग दुरकेले ,
नन्तर ,श्रीप्रभासक्षेत्रात, ३१वर्षि जलप्रत्यन्गसमाधि लावून दाखवली , हा
शरीर
५
महीने
पार्थिव देह, या अवस्थेथ
फैजाबाद ( प्रभासक्षेत्र __नैमिषारण्य ....
मग ३८ वर्षि अनेकानेक लिला चमत्कार करून आणि पर्यावरणिय क्षेत्रातकार्य केलेतं
जवलपास
करोड़ इतके वृक्ष लावलेत।
२००९ गाँडपार्टिकल्स् मशिन महाकुलकुंण्डलिनी शक्ति ने इथे बसुन विदेशातली ती मशीन बन्दपाडली।मग एक नासाचे शास्त्र ज्ञ आले त्यांना
शक्तिपातदीक्षि देउन
पूर्ण ब्रम्हाण्ड अनुभूती करवली,त्यांनी चमत्कृत होऊन कायम दीक्षिघेतली माझ्याकडून अन साधनेसलागले।
मग१२-१२/२०१२-, ला
पृथ्वी नष्ट होणारहोती म्हणुन ती निगेटीवीटी स्वताहाच्या बाँडितघेतली।
म्हणुनच
आकोल्याला सिटीस्कँन ,औसधि करावी लागली
१२-१२-२०१२--- ला सोलर ईन्जेक्शन जे सुर्यावरुन पृथ्वी कडे येत होते ते मी माझ्या
डाव्या डोक्याच्या
बाजूलि ,कृकलनाड़िवर
घेतले,त्यामुळे
पृथ्वी वाचली।
या
सारख्यि अतोनात निगेटीवीटी ज् घेतल्या
श्रद्धा चीसुद्धा
आणि
शान्तानन्द ला कोण्याच्याशिकायतीने जैल होणारहोतीतीसुद्धानिगेटिविटिघेतली
आता
ही
माझी
फिजीकल बाँडि
कमकुवतझाली,म्हणून पुनः ता.१५/७/२०१७- पासुन गुरूमनत्रजाप
वाढवला
सन १९८५ मधे
सिमलायेथिल् एक डाँक्टर मि.अवस्थी चा
ऐकूलताएकमूलगा
वारलाहोति
आठ्तास झालेमरून
तर
त्याला
जिवन्तकेले।
असे
अजुनचार
लोकं
त्यात एक डाँक्टर सुनीलजग्यासी ज्याने शिशुवीदेहीस्रोत्र लिहीले,
तो मोटर बस च्या एक्सिडेंट मधे
मरणपावला होता ,तर भुसावल हुन शिष्यपाठवुन इथुन माझीनाडितन्त्रसमारोपने
त्याला
मृत्यु तुन जिवन्तकेले
अजून
भुसावल मधे माखिजा परिवार कैन्सर हटवलेअजुन तेथीलच अमृतजग्यासीचे वडिलांच सुद्धा कैन्सर हटवला।
धिरजकर्तारि हा जुळला तेन्व्हा त्याची अवस्थाफारखराबहोती,तो ष्न्ढ होता ,त्याला शक्तिपातकरून ,नामर्दी दुरकरुन मर्द बनवले ,असे अनेक आहे ,तु जेन्व्हा नवीनवी जुळली होती तेन्वहि तूझ्यातली सुद्धानिगेटीविटी घेतली आम्हालि घ्याव लागत
हे
घेण जरूरी असतं सिद्ध अवस्थागत अध्यात्मीक रूपण् हेचतल
आमचं
सिद्धत्व आहे।
आणि अरविंद शर्मा च्यामिसेस किरण च्या गर्भपिशवितला कैन्सर हटवला
असे
अनैकानैक ,लोकान्चे रोगशोकदूरकेले,
वाचिसिद्धिनेतर अनेकांचे कल्याणकेले ,
आता जास्त आठवत् नाही पुढे आठवले तर सानगणार
[27/7, 01:35] Swamishishuvidehanand Tiw: सन १९८२ पासुन पन्जाबमधे आतंकवाद सुरुहोता
सदसदगुरुदेव ने
एक
कार्य
देशासाठीकर
म्हटलं
मग
मी
विचारातपडलो
काय
करायचं
मग
एकटानिघालो
कारंजालाड ते
पन्जाब
सायकिल यात्रा
सायकलच्यापुढे बोर्ड लावला
राष्ट्रीय एकात्मकता
आणि
एनिमि इँफ टेररिस्ट
चा
तर
पठानकोट
जवल
एक
बन्दुकाचीगोळी
पायाला घासुनगेली
(, जखम दाखवणार तूला ),
हा
वृत्तांत कळला
तेन्वहाचे
केपिएस गिल म्हणुन सैनिकदलाचे
मोठेकमान्डर होते त्यांनी
सिंह
ची
पदवी
दीली
सतिशसिंह
असं
आहे
म्हणेतुम्ही
एकटे
चाललेतं
हो
त्यांनी अभिनंदनम् केलमाझ
आणि
सदसदगुरुदेव
ने
एक
कार्य
किसानम्हणुनकरूनदाखवं
अस
म्हटलं
तर
पसरणियेथे
शेतीकेली
डवरे
हाकलले
नान्गर चालवला ,कठिण परिश्रम करून
पिक काढले
पसरणिगावातलै
लोकं
त्रास
द्यायचेत
माझ्या माघारी शेतात जनावरेसोडुनद्यायचेतं
नुकसिन
करायचे
कुनभीलोकजास्त होते तेथे मी त्या गावात एकटा
ब्राम्हण
म्हणून
द्वेषपूर्ण
वागणूक करायची
पुष्कळ अपमानित् केले ,गरिबिपरिस्थीती होती म्हैस ठेवली की दुधविकुन कामचालवायचं
सायकलने
रोज
चारा च्या पेन्ड्या बिन्धुन आणायचो
मग
हे
सर्व
सदसदगुरुदेव नी
कामाची परीक्षा करून घेतली ,आश्रमात्
नागर, वखर चालवुन घेतलं,अशा ,,प्रकारे
त्यांनी पाहिलं ।पन्जाब चे
जागोजागीचे
सर्टिफिकेट पाहिले
राष्ट्रपति चेसर्टिफिकेट बघीतले ।
शाब्ब्बासीदीली,
मग
खरा
गुरूमन्त्रदीला।
मग
एकदीवस्
म्हटलं
विदेहानन्द तू आत्ता
परमब्रम्ह झाला्
अन
म्हणाले
जा
आता
तू
प्रवचनकार
न
बनता
पर्यावरणिय कार्य कर ।
मी
म्हटलं
सन्यासीला
परत
जाता
येत
काय
,,?
त्यांनी
स्मितहास्यकेलं
म्हणाले
तू
आति
सौरमण्डलेश्वर आणि
परम्ब्रम्ह आहेस
शास्त्र गेलेचूलीत्
जा
आई वडिलांचि
साम्भळ कर
तेचखरे
सन्यासाश्रम आहे
मलि
वेदशास्त्रं पेक्षा
गुरूवाणिमधे
दृढ
श्रद्धा विश्वास,आणि धर्म
जाणायचा की गुरूवाक्यचं
सर्वकाहीआहे
म्हणुन
मी
परत आलो
पोटपाण्यासाठि
पन्चान्ग, कुण्डलि, कर्मकांड करणसुरुकेल्
अन
सिद्ध
म्हणुन आपलं कार्य करतचं आहै।
०१"४८--( २५"४८)
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपीठ ,संस्थापक अध्यक्ष
हम स्वामि शिशुविदेहानंद सरस्वती तिवारी महाराज ' अग्निहोत्रितिवारी'
तिवारी का बाडा
कारंजालाड (दत्त) 444105 जिला वाशिम महाराष्ट्र
माॅ मीराबाई ह तिवारी द्वारा आयोजित कार्यक्रम सव्वाकरोड मिट्टी के शिवलिंग निर्माण में विश्व के अनेकानेक व्यक्ति
ग्लोबल वार्मिंग एवं भूमंडलीय औष्णिकरण पर सन 1994/2005/ से कार्य अध्यात्मिक पद्धति से शुरू है
पहलाचरण एकतालिसलाख ग्यारह हजार पाचसौ का पुर्ण हो चूका,
अब
दुसराचरण एकसष्टलाख ग्यारहहजार मिट्टि के शिवलिंग निर्माण का शुरू है ,
।। अथातों वृक्षसंवर्धन जिद्न्यासा।।
एकसठलाख ग्यारहहजार शिवलिंगम् का अभिषेकम् पुजनम्
दुसराचरण पूर्ण हो गया है।
माँ
मीराबाई ह तिवारि द्वारा
आयोजित कार्यक्रम सव्वासौकरोड मिट्टी के शिवलिंगम् निर्माण
एकसष्ठ लाख ग्यारहहजार नौ सौ (६१०००००"११हजार नौ सौ )
।। अथातों वैदिक वृक्ष जिद्न्यासा ।।
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपिठ, संस्थापक अध्यक्ष स्वामिशिशुविदेहानन्द'स्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज कारंजालाड(दत्त)४४४१०५ जिला वाशिम के
माँ मिराबाई हरीकिसन तिवारि के मार्गदर्शन में ,
शक्तीपिठ में सब वृक्षसंवर्धन के कार्य होते है।
।। अथातों वृक्षसंवर्धन जिद्न्यासा ।।
,माँ मिराबाई ह तिवारि, उन पौधो का अनावरण् करती हुई ,इस अवसर पर हम
भी उपस्थित होकर उन पौधो को गोद मे लिया।
।। अथातों भक्त जिद्न्यासा ।।
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपिठ ,संस्थापक अध्यक्ष स्वामिशिशुविदेहानन्दस्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज , के तत्वावधान में
विशाल
पौधरोपण एवं
षोषखड्डा = रेनवाटर हार्वेस्टिंग , ,ओर प्रीय मित्रों, अनुयायियों ,और सदस्यों को हम
स्वामिशिशुविदेहानन्दस्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज
आवाहन करते है ..
शिवलिंगम् निर्माण में शामिल हुए।
Swamishishuvidehanand TiwariMaharaJ
SwamishishuvidehanandSwamishishusatyaVidehanand Sarswati
09921700260/09503857973---
।। अथातों आत्मरचना जिद्न्यासा।।
एक शिष्य को जानकारी चाहिए थी कि हम ( मै स्वामिशिशुविदेहानन्दस्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज ) कैसे जिवन कि कहानी आपकी ,हमने कहा एकदम शाँर्ट मे बताता हूँ ,वैसे तो बहुत बड़ि है ,लेकिन एकदम शाँर्ट मे बता ना चाहता हूँ क्योकी कुछ ऐसी घटनाऐ और रूग्जुव है जिसे आपकी बुद्धी स्विकार नही करेगी या वहातक नही पहूँचेगी.......
27/7, 01:35] Swamishishuvidehanand TiwariMaharsJ'SwamiSatyaVidehanandSarswati
मि
जन्मताचं मला वेदपाठ् येऊलागले
१२ वर्ष पर्यन्त सगले वेद,वेदान्ग ,पुराण, पाठ्झाले ,
नन्तर
लिला साठी जगाला दाखवायचे नव्हते की मी सिद्ध
अवस्थेत आहे म्हणुन विभिन्न लिला केल्या
१५ वर्षि समाधि साधली
सदसदगुरुदेव तर १० व्या वर्षिच भेटले त्यांनि त्याचवयात मन्त्रदीक्षा,स्वप्न दीक्षा,आणि ,वैभवदीक्षासहित ,ब्रम्हदण्ड दीला ( त्रिदण्डि संन्यासी म्हणुन घड़वले मला ) नन्तर पाच दण्ड़
दीक्षा दीली ,आणि माझ सिद्धत्व परिक्षा घेतल्यातं त्यात मि
चौदावेळा, अन्तरिक्षांत जाऊन आलो अन विभिन्न सोलरमण्डलातली
माती दगड़, अन धातू सदसदगुरुदेव ना आणून दाखवले ।म्हणून त्यांनीमला
सौरमण्डलेश्वर
आणि
नऊ (९), श्रिश्रिश्रिश्रिश्रिश्रिश्रिश्रिश्रि
,ची
उपाधिप्रदान
केली
मग
मी
२२वर्षि त्यांच्याच आज्ञेने
महामहतसमाधियोग
सिद्ध करून दाखवला ,त्यात जन्ममरण हे २७ हातावर उमटते ,ते पाहून
त्यांनीमला
१००००८
आणि
१०००००००००८
ची
पदवी
प्रदानकेली
या
१= महतत्व ,फिजीकल बाँडि।
०=यृक्ष्र्र् तत्व ,काँस्मिकबाँडी ।
०=ञ्र्र्र्र् तत्व ,आँराएक्सिसझोनदिक्षा बाँडि।
०=ङ्र्र्र्र्र् तत्व , स्पिरिच्युअलबाँडी ।
०= ह्र्र्र्र् तत्व , एस्ट्राँलबाँडी ।
०=ह्मौत्भिर्र्र तत्व , ह्लीक्ष्झुत्र्थ्छ्इ्ष्चित्ताभीगिणवृताष्व्र्त्रा बाँडि।
०= ज्ञ्र्र्रतत्व , ञब्रम्ह बाँडि ।
०=द्भ्र्र्त्व्र्द्ध्द्तत्व , ह्मूङीघृर्र्र् बाँडि।
०=<ब्र्र्र्तत्व ,त्न्र्र्र्त्र्र्बाँडि ।
८=स्र्र्र्तत्व , युनिवर्सल बाँडि
आणि
गन्न्न्न्न्ध्त्व
श्रेणि
प्रदानकेलि।
२८ वर्षि मि बेग्दुरकलाँ गावात
परकामयाप्रवेश ,महाभुतसिद्धि,च प्रक्टिकल जनतेलां दाखवल ,
आणि जवळपास् ४९९ लोकांचे ,महतरोग दुरकेले ,
नन्तर ,श्रीप्रभासक्षेत्रात, ३१वर्षि जलप्रत्यन्गसमाधि लावून दाखवली , हा
शरीर
५
महीने
पार्थिव देह, या अवस्थेथ
फैजाबाद ( प्रभासक्षेत्र __नैमिषारण्य ....
मग ३८ वर्षि अनेकानेक लिला चमत्कार करून आणि पर्यावरणिय क्षेत्रातकार्य केलेतं
जवलपास
करोड़ इतके वृक्ष लावलेत।
२००९ गाँडपार्टिकल्स् मशिन महाकुलकुंण्डलिनी शक्ति ने इथे बसुन विदेशातली ती मशीन बन्दपाडली।मग एक नासाचे शास्त्र ज्ञ आले त्यांना
शक्तिपातदीक्षि देउन
पूर्ण ब्रम्हाण्ड अनुभूती करवली,त्यांनी चमत्कृत होऊन कायम दीक्षिघेतली माझ्याकडून अन साधनेसलागले।
मग१२-१२/२०१२-, ला
पृथ्वी नष्ट होणारहोती म्हणुन ती निगेटीवीटी स्वताहाच्या बाँडितघेतली।
म्हणुनच
आकोल्याला सिटीस्कँन ,औसधि करावी लागली
१२-१२-२०१२--- ला सोलर ईन्जेक्शन जे सुर्यावरुन पृथ्वी कडे येत होते ते मी माझ्या
डाव्या डोक्याच्या
बाजूलि ,कृकलनाड़िवर
घेतले,त्यामुळे
पृथ्वी वाचली।
या
सारख्यि अतोनात निगेटीवीटी ज् घेतल्या
श्रद्धा चीसुद्धा
आणि
शान्तानन्द ला कोण्याच्याशिकायतीने जैल होणारहोतीतीसुद्धानिगेटिविटिघेतली
आता
ही
माझी
फिजीकल बाँडि
कमकुवतझाली,म्हणून पुनः ता.१५/७/२०१७- पासुन गुरूमनत्रजाप
वाढवला
सन १९८५ मधे
सिमलायेथिल् एक डाँक्टर मि.अवस्थी चा
ऐकूलताएकमूलगा
वारलाहोति
आठ्तास झालेमरून
तर
त्याला
जिवन्तकेले।
असे
अजुनचार
लोकं
त्यात एक डाँक्टर सुनीलजग्यासी ज्याने शिशुवीदेहीस्रोत्र लिहीले,
तो मोटर बस च्या एक्सिडेंट मधे
मरणपावला होता ,तर भुसावल हुन शिष्यपाठवुन इथुन माझीनाडितन्त्रसमारोपने
त्याला
मृत्यु तुन जिवन्तकेले
अजून
भुसावल मधे माखिजा परिवार कैन्सर हटवलेअजुन तेथीलच अमृतजग्यासीचे वडिलांच सुद्धा कैन्सर हटवला।
धिरजकर्तारि हा जुळला तेन्व्हा त्याची अवस्थाफारखराबहोती,तो ष्न्ढ होता ,त्याला शक्तिपातकरून ,नामर्दी दुरकरुन मर्द बनवले ,असे अनेक आहे ,तु जेन्व्हा नवीनवी जुळली होती तेन्वहि तूझ्यातली सुद्धानिगेटीविटी घेतली आम्हालि घ्याव लागत
हे
घेण जरूरी असतं सिद्ध अवस्थागत अध्यात्मीक रूपण् हेचतल
आमचं
सिद्धत्व आहे।
आणि अरविंद शर्मा च्यामिसेस किरण च्या गर्भपिशवितला कैन्सर हटवला
असे
अनैकानैक ,लोकान्चे रोगशोकदूरकेले,
वाचिसिद्धिनेतर अनेकांचे कल्याणकेले ,
आता जास्त आठवत् नाही पुढे आठवले तर सानगणार
[27/7, 01:35] Swamishishuvidehanand Tiw: सन १९८२ पासुन पन्जाबमधे आतंकवाद सुरुहोता
सदसदगुरुदेव ने
एक
कार्य
देशासाठीकर
म्हटलं
मग
मी
विचारातपडलो
काय
करायचं
मग
एकटानिघालो
कारंजालाड ते
पन्जाब
सायकिल यात्रा
सायकलच्यापुढे बोर्ड लावला
राष्ट्रीय एकात्मकता
आणि
एनिमि इँफ टेररिस्ट
चा
तर
पठानकोट
जवल
एक
बन्दुकाचीगोळी
पायाला घासुनगेली
(, जखम दाखवणार तूला ),
हा
वृत्तांत कळला
तेन्वहाचे
केपिएस गिल म्हणुन सैनिकदलाचे
मोठेकमान्डर होते त्यांनी
सिंह
ची
पदवी
दीली
सतिशसिंह
असं
आहे
म्हणेतुम्ही
एकटे
चाललेतं
हो
त्यांनी अभिनंदनम् केलमाझ
आणि
सदसदगुरुदेव
ने
एक
कार्य
किसानम्हणुनकरूनदाखवं
अस
म्हटलं
तर
पसरणियेथे
शेतीकेली
डवरे
हाकलले
नान्गर चालवला ,कठिण परिश्रम करून
पिक काढले
पसरणिगावातलै
लोकं
त्रास
द्यायचेत
माझ्या माघारी शेतात जनावरेसोडुनद्यायचेतं
नुकसिन
करायचे
कुनभीलोकजास्त होते तेथे मी त्या गावात एकटा
ब्राम्हण
म्हणून
द्वेषपूर्ण
वागणूक करायची
पुष्कळ अपमानित् केले ,गरिबिपरिस्थीती होती म्हैस ठेवली की दुधविकुन कामचालवायचं
सायकलने
रोज
चारा च्या पेन्ड्या बिन्धुन आणायचो
मग
हे
सर्व
सदसदगुरुदेव नी
कामाची परीक्षा करून घेतली ,आश्रमात्
नागर, वखर चालवुन घेतलं,अशा ,,प्रकारे
त्यांनी पाहिलं ।पन्जाब चे
जागोजागीचे
सर्टिफिकेट पाहिले
राष्ट्रपति चेसर्टिफिकेट बघीतले ।
शाब्ब्बासीदीली,
मग
खरा
गुरूमन्त्रदीला।
मग
एकदीवस्
म्हटलं
विदेहानन्द तू आत्ता
परमब्रम्ह झाला्
अन
म्हणाले
जा
आता
तू
प्रवचनकार
न
बनता
पर्यावरणिय कार्य कर ।
मी
म्हटलं
सन्यासीला
परत
जाता
येत
काय
,,?
त्यांनी
स्मितहास्यकेलं
म्हणाले
तू
आति
सौरमण्डलेश्वर आणि
परम्ब्रम्ह आहेस
शास्त्र गेलेचूलीत्
जा
आई वडिलांचि
साम्भळ कर
तेचखरे
सन्यासाश्रम आहे
मलि
वेदशास्त्रं पेक्षा
गुरूवाणिमधे
दृढ
श्रद्धा विश्वास,आणि धर्म
जाणायचा की गुरूवाक्यचं
सर्वकाहीआहे
म्हणुन
मी
परत आलो
पोटपाण्यासाठि
पन्चान्ग, कुण्डलि, कर्मकांड करणसुरुकेल्
अन
सिद्ध
म्हणुन आपलं कार्य करतचं आहै।
Tuesday, 25 July 2017
Om-
Swamishishuvidehanand Tiw: Swamishishuvidehanand Tiw: ता २५/७/२०१७-दोपहर
२"१८-( १४"१८)
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपीठ ,संस्थापक अध्यक्ष
हम स्वामि शिशुविदेहानंद सरस्वती तिवारी महाराज ' अग्निहोत्रितिवारी'
तिवारी का बाडा
कारंजालाड (दत्त) 444105 जिला वाशिम महाराष्ट्र
माॅ मीराबाई ह तिवारी द्वारा आयोजित कार्यक्रम सव्वाकरोड मिट्टी के शिवलिंग निर्माण में विश्व के अनेकानेक व्यक्ति
ग्लोबल वार्मिंग एवं भूमंडलीय औष्णिकरण पर सन 1994/2005/ से कार्य अध्यात्मिक पद्धति से शुरू है
पहलाचरण एकतालिसलाख ग्यारह हजार पाचसौ का पुर्ण हो चूका,
अब
दुसराचरण एकसष्टलाख ग्यारहहजार मिट्टि के शिवलिंग निर्माण का शुरू है ,
।। अथातों वृक्षसंवर्धन जिद्न्यासा।।
एकसठलाख ग्यारहहजार शिवलिंगम् का अभिषेकम् पुजनम्
दुसराचरण पूर्ण हो गया है।
माँ
मीराबाई ह तिवारि द्वारा
आयोजित कार्यक्रम सव्वासौकरोड मिट्टी के शिवलिंगम् निर्माण
एकसष्ठ लाख ग्यारहहजार नौ सौ (६१०००००"११हजार नौ सौ )
।। अथातों वैदिक वृक्ष जिद्न्यासा ।।
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपिठ, संस्थापक अध्यक्ष स्वामिशिशुविदेहानन्द'स्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज कारंजालाड(दत्त)४४४१०५ जिला वाशिम के
माँ मिराबाई हरीकिसन तिवारि के मार्गदर्शन में ,
शक्तीपिठ में सब वृक्षसंवर्धन के कार्य होते है।
।। अथातों वृक्षसंवर्धन जिद्न्यासा ।।
,माँ मिराबाई ह तिवारि, उन पौधो का अनावरण् करती हुई ,इस अवसर
।। अथातों भक्त जिद्न्यासा ।।
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपिठ ,संस्थापक अध्यक्ष स्वामिशिशुविदेहानन्दस्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज , के तत्वावधान में
विशाल
पौधरोपण एवं
षोषखड्डा = रेनवाटर हार्वेस्टिंग , ,ओर प्रीय मित्रों, अनुयायियों ,और सदस्यों को हम
स्वामिशिशुविदेहानन्दस्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज
आवाहन करते है ..
शिवलिंगम् निर्माण में शामिल हुए।
Swamishishuvidehanand TiwariMaharaJ
SwamishishuvidehanandSwamishishusatyaVidehanand Sarswati
09921700260/09503857973---
।। अथातों भक्त जिद्न्यासा
*इस संसार में प्रायः लोग कहते है सदाचरण और जीवन मूल्य श्रेयस्कर है किंतु इस मार्ग पर चलना बड़ा कठिन है। नैतिकता धारण करना दुष्कर कार्य है जबकि सच्चाई यह है कि सदाचरण जीवात्मा का मूलभूत स्वभाव है। बस, सुविधा और स्वार्थ पूर्ति के मानस के कारण ही विकार अपनी जगह बना लेते है।*
*यदि उदाहरण के लिए देखें तो सत्यनिष्ठा एक जीवन मूल्य है। हमें सच बोलकर सदा अच्छा अनुभव होता है, आत्मिक शान्ति और संतुष्टि का अनुभव होता है, पवित्रता का एहसास होता है और सच बोलना सहज भी लगता है।*
*वहीं जब झूठ का आश्रय लेना पड़े तो मन कचोटता है, गला सूखता है, दिल बैठ सा जाता है। वह इसलिए कि झूठ हमारी सहज स्वभाविक प्रतिक्रिया नहीं होती।*
*सच कठिन हो सकता है, पर प्रकट करते हुए बड़ा सहज महसुस होता है,*
*और परिणाम संतोष प्रदान करता है।*
*लेकिन सवाल उठता है कि इन पर चलना जब हमारे जीवन का स्वभाव है तो हम इन पर चल क्यों नहीं पाते?*
*विषम परिस्थितियां आते ही डगमगा क्यों जाते हैं?*
*क्यों आसान लगता है अनैतिक हो जाना,*
*क्यों निष्ठावान रहना दुष्कर लगता है?*
*कारण साफ है,*
*क्षणिक सुख और सुविधा की तरफ ढल पडना बहुत ही आसान होता है,*
*जबकि दृढ मनोबल बनाए रखना*
*कठिन पुरूषार्थ की मांग करता है।*
*जिस तरह हीरे में चमकने का प्राकृतिक स्वभाव होने के उपरांत भी वह हमें प्राकृतिक चमकदार प्राप्त नहीं होता।*
*हीरा स्वयं बहुत ही कठोर पदार्थ होता है। उसे चमकाने के लिए, उससे भी कठोर व तीक्ष्ण औजारों से प्रसंस्करण की आवश्यकता होती है।*
*उसकी आभा उभारने के लिए कटाई-घिसाई का कठिन श्रम करना पडता है। दाग वाला हिस्सा काट कर दूर करना पडता है। उस पर सुनियोजित और सप्रमाण पहलू बनाने होते है।*
*सभी पहलुओं घिस कर चिकना करने पर ही हीरा अपनी उत्कृष्ट चमक देता है। अगर हीरे में चमक अभिप्रेत है तो उसे कठिन श्रम से गुजरना ही पडेगा।*
*ठीक उसी प्रकार सद्गुण हमारी अंतरात्मा का स्वभाव है, अपनाने कठिन होते ही है। सदाचार हमारे जीवन के लिए हितकर है,*
*श्रेयस्कर है।*
*यदि जीवन को दैदिप्यमान करना है तो कठिन परिश्रम और पुरूषार्थ से गुजरना ही होगा है। यदि सुंदर चरित्र का निर्माण हमारी ज्वलंत इच्छा है तो कटाव धिसाव के कठिन दौर से गुजरना ही होगा। सुहाते तुच्छ स्वार्थ के दाग हटाने होंगे।*
*आचार विचार के प्रत्येक पहलू को नियमबद्ध चिकना बनाना ही होगा।*
*यदि लक्ष्य उत्कृष्ट जीवन है तो स्वभाविक है,*
*उन मूल्यों को प्राप्त करने लिए पुरूषार्थ भी अतिशय कठिन ही होगा।*
*बाह्य पदार्थों को बाहर ही छोड़कर और नेत्रों की दृष्टि को भौंहों के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके जिसकी इन्द्रियाँ मन और बुद्धि अपने वश में हैं जो मोक्ष परायण है*
*तथा जो इच्छा भय और क्रोध से सर्वथा रहित है वह मुनि सदा मुक्त ही है।*
*स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्*
*परमात्मा के सिवाय सब पदार्थ बाह्य हैं।*
*बाह्य पदार्थों को बाहर ही छोड़ देने का तात्पर्य है कि मन से बाह्य विषयों का चिन्तन न करे।*
*बाह्य पदार्थों के सम्बन्ध का त्याग कर्मयोग में सेवा के द्वारा और ज्ञानयोग में विवेक के द्वारा किया जाता है।*
*यहाँ भगवति ध्यानयोग के द्वारा बाह्य पदार्थों से सम्बन्ध विच्छेद की बात कह रही हैं। ध्यानयोग में एकमात्र परमात्मा का ही चिन्तन होने से बाह्य पदार्थों से विमुखता हो जाती है।*
*वास्तव में बाह्य पदार्थ बाधक नहीं हैं।*
*बाधक है इनसे रागपूर्वक माना हुआ अपना सम्बन्ध।*
*इस माने हुए सम्बन्ध का त्याग करने में ही (उपर्युक्त )पदों का तात्पर्य है।*
*(चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः) यहाँ (भ्रुवोः अन्तरे)*
*पदों से*
*दृष्टिको दोनों भौंहों के बीच में रखना अथवा दृष्टि को नासिका के अग्र भाग पर रखना (गीता 6/13) ये दोनों ही अर्थ लिये जा सकते हैं।*
*ध्यानकाल में नेत्रों को सर्वथा बंद रखने से लयदोष अर्थात् निद्रा आने की सम्भावना रहती है और नेत्रों को सर्वथा खुला रखने से (सामने दृश्य रहनेसे) विक्षेपदोष आने की सम्भावना रहती है।*
*इन दोनों प्रकार के दोषों को दूर करने के लिये*
*आधे मुँदे हुए*
*नेत्रोंकी दृष्टिको दोनों भौंहों के बीच स्थापित करने के लिये कहा गया है।*
*प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ*
*नासिका से बाहर निकलने वाली वायु को प्राण और नासिका के भीतर जाने वाली वायु को अपान कहते हैं।प्राणवायु की गति दीर्घ और अपानवायु की गति लघु होती है। इन दोनों को सम करने के लिये पहले बायीं नासिका से अपानवायु को भीतर ले जाकर दायीं नासिका से प्राणवायु को बाहर निकाले। फिर दायीं नासिका से अपानवायु को भीतर ले जाकर बायीं नासिका से प्राणवायु को बाहर निकाले। ,*
*इन सब क्रियाओं में बराबर समय लगना चाहिये।*
*इस प्रकार लगातार अभ्यास करते रहने से प्राण और अपान वायु की गति सम शान्त और सूक्ष्म हो जाती है। जब नासिका के बाहर और भीतर तथा कण्ठादि देशमें वायुके स्पर्श का ज्ञान न हो तब समझना चाहिये कि प्राणअपान की गति सम हो गयी है।*
*इन दोनोंकी गति सम होने पर (लक्ष्य परमात्मा रहनेसे) मन से स्वाभाविक ही परमात्मा का चिन्तन होने लगता है।*
*ध्यानयोग में इस प्राणायाम की आवश्यकता होने से ही इसका उपर्युक्त पदों में उल्लेख किया गया है।*
*यतेन्द्रियमनोबुद्धिः*
*प्रत्येक मनुष्य में एक तो इन्द्रियों का ज्ञान रहता है और एक बुद्धि का ज्ञान। इन्द्रियाँ और बुद्धि दोनों के बीच में मन का निवास है।*
*मनुष्य को देखना यह है कि उसके मन पर इन्द्रियों के ज्ञान का प्रभाव है या बुद्धि के ज्ञान का प्रभाव है अथवा आंशिक रूप से दोनों के ज्ञान का प्रभाव है।*
*इन्द्रियों के ज्ञान में संयोग का प्रभाव पड़ता है और बुद्धि के ज्ञान में परिणाम का। जिन मनुष्यों के मन पर केवल इन्द्रियों के ज्ञान का प्रभाव है वे संयोगजन्य सुख भोग में ही लगे रहते हैं*
*और जिनके मन पर बुद्धिके ज्ञान का प्रभाव है वे (परिणामकी ओर दृष्टि रहनेसे) सुखभोग का त्याग करने में समर्थ हो जाते हैं*
*न तेषु रमते बुधः (गीता 5/ 22)*
*प्रायः साधकों के मन पर आंशिक रूप से इन्द्रियों और बुद्धि दोनों के ज्ञान का प्रभाव रहता है। उनके मन में इन्द्रियों तथा बुद्धि के ज्ञान का द्वन्द्व चलता रहता है। इसलिये वे अपने विवेक को महत्त्व नहीं दे पाते और जो करना चाहते हैं उसे कर भी नहीं पाते।*
*यह द्वन्द्व ही ध्यान में बाधक है।*
*अतः यहाँ मन बुद्धि तथा इन्द्रियों को वश में करने का तात्पर्य है कि मन पर केवल बुद्धिके ज्ञान का प्रभाव रह जाय इन्द्रियों के ज्ञान का प्रभाव सर्वथा मिट जाय।*
*मुनिर्मोक्षपरायणः*
परमात्मप्राप्ति करना ही जिनका लक्ष्य है ऐसे परमात्म स्वरूप का मनन करने वाले साधक को यहाँ,
*मोक्षपरायणः*
कहा गया है।
*परमात्मतत्त्व सब देश काल आदि में परिपूर्ण होने के कारण सदा सर्वदा सबको प्राप्त ही है। परन्तु दृढ़ उद्देश्य न होने के कारण ऐसे नित्यप्राप्त तत्त्व की अनुभूति में देरी हो रही है।*
*यदि एक दृढ़ उद्देश्य बन जाय तो तत्त्व की अनुभूति में देरी का काम नहीं है। वास्तव में उद्देश्य पहले से ही बना बनाया है क्योंकि परमात्म प्राप्ति के लिये ही यह मनुष्य शरीर मिला है।*
*केवल इस उद्देश्य को पहचानना है।*
*जब साधक इस उद्देश्य को पहचान लेता है तब उसमें परमात्म प्राप्ति की लालसा उत्पन्न हो जाती है।*
*यह लालसा संसार की सब कामनाओं को मिटाकर साधक को परमात्मतत्त्व का अनुभव करा देती है।*
*अतः परमात्मप्राप्ति के उद्देश्य को पहचानने के लिये ही यहाँ*
*मोक्षपरायणः*
पद का प्रयोग हुआ है।
*कर्मयोग सांख्ययोग ध्यानयोग भक्तियोग आदि सभी साधनों में एक दृढ़ निश्चय या उद्देश्य की बड़ी आवश्यकता है।*
*अगर अपने कल्याण का उद्देश्य ही दृढ़ नहीं होगा तो साधन से सिद्धि कैसे मिलेगी इसलिये यहाँ*
*मोक्षपरायणः*
पद से ध्यानयोग में दृढ़ निश्चय की आवश्यकता बतायी गयी है।
*विगतेच्छाभयक्रोधो यः*
अपनी इच्छाकी पूर्तिमें बाधा देनेवाले प्राणीको अपने से सबल माननेपर उससे भय होता है कि निर्बल मानने से उस पर क्रोध आता है।
*ऐसे ही जीने की इच्छा रहने पर मृत्यु से भय होता है और दूसरों से अपनी इच्छापूर्ति करवाने तथा दूसरों पर अपना अधिकार जमाने की इच्छा से क्रोध होता है। अतः भय और क्रोध होने में इच्छा ही मुख्य है। यदि मनुष्य में इच्छा पूर्ति का उद्देश्य न रहे प्रत्युत एकमात्र परमात्मप्राप्ति का उद्देश्य रह जाय तो भयक्रोध सहित इच्छा का सर्वथा अभाव हो जाता है। इच्छा का सर्वथा अभाव होने पर मनुष्य मुक्त हो जाता है। कारण कि वस्तुओं की और जीने की इच्छा से ही मनुष्य जन्ममरण रूप बन्धन में पड़ताहै। साधक को गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये कि क्या वस्तुओं की इच्छा से वस्तुएँ मिल जाती हैं और क्या जीने की इच्छा से मृत्यु से बच जाते हैं वास्तविकता तो यह है कि न तो वस्तुओं की इच्छा पूरी कर सकते हैं और न मृत्यु से बच सकते हैं। इसलिये यदि साधक का यह दृढ़ निश्चय हो जाय कि मुझे एक परमात्मप्राप्ति के सिवाय कुछ नहीं चाहिये तो वह वर्तमान में ही मुक्त हो सकता है। परन्तु यदि वस्तुओं की और जीने की इच्छा रहेगी तो इच्छा कभी पूरी नहीं होगी और मृत्यु के भय से भी बचाव नहीं होगा तथा क्रोध से भी छुटकारा नहीं होगा।*
*इसलिये मुक्त होने के लिये इच्छारहित होना आवश्यक है।यदि वस्तु मिलने वाली है तो इच्छा किये बिना भी मिलेगी और यदि वस्तु नहीं मिलने वाली है तो इच्छा करने पर भी नहीं मिलेगी।*
*अतः वस्तु का मिलना या न मिलना इच्छा के अधीन नहीं है प्रत्युत किसी विधान के अधीन है। जो वस्तु इच्छा के अधीन नहीं है उसकी इच्छा को छोड़ने में क्या कठिनाई है यदि वस्तु की इच्छा पूरी होती हो तो उसे पूरी करने का प्रयत्न करते और यदि जीने की इच्छा पूरी होती हो तो मृत्यु से बचने का प्रयत्न करते।*
*परन्तु इच्छा के अनुसार न तो सब वस्तुएँ मिलती हैं और न मृत्यु से बचाव ही होता है। यदि वस्तुओं की इच्छा न रहे तो जीवन आनन्दमय हो जाता है और यदि जीने की इच्छा न रहे तो मृत्यु भी आनन्दमयी हो जाती है।*
*जीवन तभी कष्टमय होता है जब वस्तुओं की इच्छा करते हैं और मृत्यु तभी कष्टमयी होती है जब जीने की इच्छा करते हैं। इसलिये जिसने वस्तुओं की और जीने की इच्छा का सर्वथा त्याग कर दिया है वह जीते जी मुक्त हो जाता है अमर हो जाता है।*
*सदा मुक्त एव सः*
*उत्पत्ति विनाश शील पदार्थों के साथ अपना सम्बन्ध मानना ही बन्धन है।*
*इस माने हुए सम्बन्ध का सर्वथा त्याग करना ही मुक्ति है।*
*जो मुक्त हो गया है उस पर किसी भी घटना परिस्थिति निन्दास्तुति अनुकूलता प्रतिकूलता जीवनमरण आदि का किञ्चिन्मात्र भी असर नहीं पड़ता।*
*सदा मुक्त एव*
*पदों का तात्पर्य है कि वास्तव में साधक स्वरूप से सदा मुक्त ही है। केवल उत्पन्न और नष्ट होने वाली वस्तुओं से अपना सम्बन्ध माननेके कारण उसे अपने मुक्त स्वरूप का अनुभव नहीं हो रहा है। संसारसे माना हुआ सम्बन्ध मिटते ही स्वतःसिद्ध मुक्ति का अनुभव हो जाता है।*
*सम्बन्ध भगवान्ने योगनिष्ठा और सांख्यनिष्ठा का वर्णन करके दोनों के लिये उपयोगी ध्यानयोग का वर्णन किया। अब सुगमता पूर्वक कल्याण करने वाली भगवन्निष्ठा का वर्णन करते हैं।*
*इस संसार में निर्जीव व सजीव, चाहे वह चर हो अथवा अचर तथा केवल सजीव अथवा निर्जीव ही नहीं, सभी पञ्च भौतिक तत्व तक प्रत्येक किसी न किसी प्रकार से गतिमान बना हुआ है |*
*इस प्रकार गतिमान बने रहने को हम एक प्रकार की “यात्रा” करना कह सकते हैं |*
*यात्रा उसे कहते हैं, जहाँ सामने किसी न किसी प्रकार का एक लक्ष्य हो और उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए गतिमान होना आवश्यक है | बिना किसी लक्ष्य के यात्रा हो ही नहीं सकती |*
*मनुष्य के बारे में तो कहा जा सकता है कि वह कोई न कोई एक लक्ष्य स्वयं निर्धारित करता है और फिर उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यात्रा प्रारम्भ करता है परन्तु शेष चर-अचर जीवों तथा निर्जीव वस्तुओं का भला क्या लक्ष्य हो सकता है ?*
*इस प्रकार सोचना सही है | यह लक्ष्य किसी न किसी का तो निर्धारित किया हुआ है, जिस कारण से इस संसार में सभी सजीव, निर्जीव तथा पांच भौतिक तत्वों की यह यात्रा अनवरत चल रही है |*
*परमात्मा ने ब्रह्माण्ड को बनाया, चेतन-अचेतन को बनाया और अंततः उसने मनुष्य को बनाया |*
*परमात्मा को मानव बनाने की आवश्यकता क्यों हुई ?*
*केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जो सोच-समझ सकता है और अपना लक्ष्य निर्धारित कर सकता है | अतः कहा जा सकता है कि मनुष्य के द्वारा ही इस यात्रा का प्रारम्भ होता है और मनुष्य के द्वारा ही इस यात्रा का अंत हो सकता है |*
*मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना ही यही है कि वह अपने जीवन का लक्ष्य अभी तक सही प्रकार से निर्धारित नहीं कर सका है, तभी तो उसकी यात्रा कभी समाप्त नहीं हो पा रही है |*
*लक्ष्य एक ही हो सकता है, अनेक नहीं | अनेक तो कामनाएं हो सकती है |*
*हमें समझना होगा कि हमारे लिए यहाँ दो ही अनंत हैं, एक तो हमारी कामनाएं और दूसरा परमात्मा |*
*हम अनंत को तो पाना चाहते हैं परन्तु हमारा यह अनंत परमात्मा न होकर हमारी कामनाएं होती है | कामनाएं अनंत होती हैं और इस कारण से उनको कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता |*
*परमात्मा भी अनन्त है परन्तु उसे प्राप्त किया जा सकता है |*
*मानव जन्म पाकर हमारा लक्ष्य केवल कामनाओं को पूरा करना ही रह गया है,*
*परमात्मा को पाना नहीं रहा*
*यही हमारी जीवन यात्रा का पथ-विचलन है।*
*मनुष्य को यही सोचना और समझना होगा कि अनंत को पाने के लिए यात्रा को भी अनंत किया जाये अथवा अनंत को पाकर यात्रा का अंत कर दिया जाये |*
*अगर अनंत को पाने के लिए अनंत काल तक यात्रा करनी है तो संसार के भोग विलास की कामनाएं मन में उत्पन्न करते रहें और अगर अनंत को पाकर यात्रा समाप्त करनी है, तो परमात्मा को पाने की ही एक मात्र कामना करनी पडती है।*
२"१८-( १४"१८)
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपीठ ,संस्थापक अध्यक्ष
हम स्वामि शिशुविदेहानंद सरस्वती तिवारी महाराज ' अग्निहोत्रितिवारी'
तिवारी का बाडा
कारंजालाड (दत्त) 444105 जिला वाशिम महाराष्ट्र
माॅ मीराबाई ह तिवारी द्वारा आयोजित कार्यक्रम सव्वाकरोड मिट्टी के शिवलिंग निर्माण में विश्व के अनेकानेक व्यक्ति
ग्लोबल वार्मिंग एवं भूमंडलीय औष्णिकरण पर सन 1994/2005/ से कार्य अध्यात्मिक पद्धति से शुरू है
पहलाचरण एकतालिसलाख ग्यारह हजार पाचसौ का पुर्ण हो चूका,
अब
दुसराचरण एकसष्टलाख ग्यारहहजार मिट्टि के शिवलिंग निर्माण का शुरू है ,
।। अथातों वृक्षसंवर्धन जिद्न्यासा।।
एकसठलाख ग्यारहहजार शिवलिंगम् का अभिषेकम् पुजनम्
दुसराचरण पूर्ण हो गया है।
माँ
मीराबाई ह तिवारि द्वारा
आयोजित कार्यक्रम सव्वासौकरोड मिट्टी के शिवलिंगम् निर्माण
एकसष्ठ लाख ग्यारहहजार नौ सौ (६१०००००"११हजार नौ सौ )
।। अथातों वैदिक वृक्ष जिद्न्यासा ।।
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपिठ, संस्थापक अध्यक्ष स्वामिशिशुविदेहानन्द'स्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज कारंजालाड(दत्त)४४४१०५ जिला वाशिम के
माँ मिराबाई हरीकिसन तिवारि के मार्गदर्शन में ,
शक्तीपिठ में सब वृक्षसंवर्धन के कार्य होते है।
।। अथातों वृक्षसंवर्धन जिद्न्यासा ।।
,माँ मिराबाई ह तिवारि, उन पौधो का अनावरण् करती हुई ,इस अवसर
।। अथातों भक्त जिद्न्यासा ।।
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपिठ ,संस्थापक अध्यक्ष स्वामिशिशुविदेहानन्दस्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज , के तत्वावधान में
विशाल
पौधरोपण एवं
षोषखड्डा = रेनवाटर हार्वेस्टिंग , ,ओर प्रीय मित्रों, अनुयायियों ,और सदस्यों को हम
स्वामिशिशुविदेहानन्दस्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज
आवाहन करते है ..
शिवलिंगम् निर्माण में शामिल हुए।
Swamishishuvidehanand TiwariMaharaJ
SwamishishuvidehanandSwamishishusatyaVidehanand Sarswati
09921700260/09503857973---
।। अथातों भक्त जिद्न्यासा
*इस संसार में प्रायः लोग कहते है सदाचरण और जीवन मूल्य श्रेयस्कर है किंतु इस मार्ग पर चलना बड़ा कठिन है। नैतिकता धारण करना दुष्कर कार्य है जबकि सच्चाई यह है कि सदाचरण जीवात्मा का मूलभूत स्वभाव है। बस, सुविधा और स्वार्थ पूर्ति के मानस के कारण ही विकार अपनी जगह बना लेते है।*
*यदि उदाहरण के लिए देखें तो सत्यनिष्ठा एक जीवन मूल्य है। हमें सच बोलकर सदा अच्छा अनुभव होता है, आत्मिक शान्ति और संतुष्टि का अनुभव होता है, पवित्रता का एहसास होता है और सच बोलना सहज भी लगता है।*
*वहीं जब झूठ का आश्रय लेना पड़े तो मन कचोटता है, गला सूखता है, दिल बैठ सा जाता है। वह इसलिए कि झूठ हमारी सहज स्वभाविक प्रतिक्रिया नहीं होती।*
*सच कठिन हो सकता है, पर प्रकट करते हुए बड़ा सहज महसुस होता है,*
*और परिणाम संतोष प्रदान करता है।*
*लेकिन सवाल उठता है कि इन पर चलना जब हमारे जीवन का स्वभाव है तो हम इन पर चल क्यों नहीं पाते?*
*विषम परिस्थितियां आते ही डगमगा क्यों जाते हैं?*
*क्यों आसान लगता है अनैतिक हो जाना,*
*क्यों निष्ठावान रहना दुष्कर लगता है?*
*कारण साफ है,*
*क्षणिक सुख और सुविधा की तरफ ढल पडना बहुत ही आसान होता है,*
*जबकि दृढ मनोबल बनाए रखना*
*कठिन पुरूषार्थ की मांग करता है।*
*जिस तरह हीरे में चमकने का प्राकृतिक स्वभाव होने के उपरांत भी वह हमें प्राकृतिक चमकदार प्राप्त नहीं होता।*
*हीरा स्वयं बहुत ही कठोर पदार्थ होता है। उसे चमकाने के लिए, उससे भी कठोर व तीक्ष्ण औजारों से प्रसंस्करण की आवश्यकता होती है।*
*उसकी आभा उभारने के लिए कटाई-घिसाई का कठिन श्रम करना पडता है। दाग वाला हिस्सा काट कर दूर करना पडता है। उस पर सुनियोजित और सप्रमाण पहलू बनाने होते है।*
*सभी पहलुओं घिस कर चिकना करने पर ही हीरा अपनी उत्कृष्ट चमक देता है। अगर हीरे में चमक अभिप्रेत है तो उसे कठिन श्रम से गुजरना ही पडेगा।*
*ठीक उसी प्रकार सद्गुण हमारी अंतरात्मा का स्वभाव है, अपनाने कठिन होते ही है। सदाचार हमारे जीवन के लिए हितकर है,*
*श्रेयस्कर है।*
*यदि जीवन को दैदिप्यमान करना है तो कठिन परिश्रम और पुरूषार्थ से गुजरना ही होगा है। यदि सुंदर चरित्र का निर्माण हमारी ज्वलंत इच्छा है तो कटाव धिसाव के कठिन दौर से गुजरना ही होगा। सुहाते तुच्छ स्वार्थ के दाग हटाने होंगे।*
*आचार विचार के प्रत्येक पहलू को नियमबद्ध चिकना बनाना ही होगा।*
*यदि लक्ष्य उत्कृष्ट जीवन है तो स्वभाविक है,*
*उन मूल्यों को प्राप्त करने लिए पुरूषार्थ भी अतिशय कठिन ही होगा।*
*बाह्य पदार्थों को बाहर ही छोड़कर और नेत्रों की दृष्टि को भौंहों के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके जिसकी इन्द्रियाँ मन और बुद्धि अपने वश में हैं जो मोक्ष परायण है*
*तथा जो इच्छा भय और क्रोध से सर्वथा रहित है वह मुनि सदा मुक्त ही है।*
*स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्*
*परमात्मा के सिवाय सब पदार्थ बाह्य हैं।*
*बाह्य पदार्थों को बाहर ही छोड़ देने का तात्पर्य है कि मन से बाह्य विषयों का चिन्तन न करे।*
*बाह्य पदार्थों के सम्बन्ध का त्याग कर्मयोग में सेवा के द्वारा और ज्ञानयोग में विवेक के द्वारा किया जाता है।*
*यहाँ भगवति ध्यानयोग के द्वारा बाह्य पदार्थों से सम्बन्ध विच्छेद की बात कह रही हैं। ध्यानयोग में एकमात्र परमात्मा का ही चिन्तन होने से बाह्य पदार्थों से विमुखता हो जाती है।*
*वास्तव में बाह्य पदार्थ बाधक नहीं हैं।*
*बाधक है इनसे रागपूर्वक माना हुआ अपना सम्बन्ध।*
*इस माने हुए सम्बन्ध का त्याग करने में ही (उपर्युक्त )पदों का तात्पर्य है।*
*(चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः) यहाँ (भ्रुवोः अन्तरे)*
*पदों से*
*दृष्टिको दोनों भौंहों के बीच में रखना अथवा दृष्टि को नासिका के अग्र भाग पर रखना (गीता 6/13) ये दोनों ही अर्थ लिये जा सकते हैं।*
*ध्यानकाल में नेत्रों को सर्वथा बंद रखने से लयदोष अर्थात् निद्रा आने की सम्भावना रहती है और नेत्रों को सर्वथा खुला रखने से (सामने दृश्य रहनेसे) विक्षेपदोष आने की सम्भावना रहती है।*
*इन दोनों प्रकार के दोषों को दूर करने के लिये*
*आधे मुँदे हुए*
*नेत्रोंकी दृष्टिको दोनों भौंहों के बीच स्थापित करने के लिये कहा गया है।*
*प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ*
*नासिका से बाहर निकलने वाली वायु को प्राण और नासिका के भीतर जाने वाली वायु को अपान कहते हैं।प्राणवायु की गति दीर्घ और अपानवायु की गति लघु होती है। इन दोनों को सम करने के लिये पहले बायीं नासिका से अपानवायु को भीतर ले जाकर दायीं नासिका से प्राणवायु को बाहर निकाले। फिर दायीं नासिका से अपानवायु को भीतर ले जाकर बायीं नासिका से प्राणवायु को बाहर निकाले। ,*
*इन सब क्रियाओं में बराबर समय लगना चाहिये।*
*इस प्रकार लगातार अभ्यास करते रहने से प्राण और अपान वायु की गति सम शान्त और सूक्ष्म हो जाती है। जब नासिका के बाहर और भीतर तथा कण्ठादि देशमें वायुके स्पर्श का ज्ञान न हो तब समझना चाहिये कि प्राणअपान की गति सम हो गयी है।*
*इन दोनोंकी गति सम होने पर (लक्ष्य परमात्मा रहनेसे) मन से स्वाभाविक ही परमात्मा का चिन्तन होने लगता है।*
*ध्यानयोग में इस प्राणायाम की आवश्यकता होने से ही इसका उपर्युक्त पदों में उल्लेख किया गया है।*
*यतेन्द्रियमनोबुद्धिः*
*प्रत्येक मनुष्य में एक तो इन्द्रियों का ज्ञान रहता है और एक बुद्धि का ज्ञान। इन्द्रियाँ और बुद्धि दोनों के बीच में मन का निवास है।*
*मनुष्य को देखना यह है कि उसके मन पर इन्द्रियों के ज्ञान का प्रभाव है या बुद्धि के ज्ञान का प्रभाव है अथवा आंशिक रूप से दोनों के ज्ञान का प्रभाव है।*
*इन्द्रियों के ज्ञान में संयोग का प्रभाव पड़ता है और बुद्धि के ज्ञान में परिणाम का। जिन मनुष्यों के मन पर केवल इन्द्रियों के ज्ञान का प्रभाव है वे संयोगजन्य सुख भोग में ही लगे रहते हैं*
*और जिनके मन पर बुद्धिके ज्ञान का प्रभाव है वे (परिणामकी ओर दृष्टि रहनेसे) सुखभोग का त्याग करने में समर्थ हो जाते हैं*
*न तेषु रमते बुधः (गीता 5/ 22)*
*प्रायः साधकों के मन पर आंशिक रूप से इन्द्रियों और बुद्धि दोनों के ज्ञान का प्रभाव रहता है। उनके मन में इन्द्रियों तथा बुद्धि के ज्ञान का द्वन्द्व चलता रहता है। इसलिये वे अपने विवेक को महत्त्व नहीं दे पाते और जो करना चाहते हैं उसे कर भी नहीं पाते।*
*यह द्वन्द्व ही ध्यान में बाधक है।*
*अतः यहाँ मन बुद्धि तथा इन्द्रियों को वश में करने का तात्पर्य है कि मन पर केवल बुद्धिके ज्ञान का प्रभाव रह जाय इन्द्रियों के ज्ञान का प्रभाव सर्वथा मिट जाय।*
*मुनिर्मोक्षपरायणः*
परमात्मप्राप्ति करना ही जिनका लक्ष्य है ऐसे परमात्म स्वरूप का मनन करने वाले साधक को यहाँ,
*मोक्षपरायणः*
कहा गया है।
*परमात्मतत्त्व सब देश काल आदि में परिपूर्ण होने के कारण सदा सर्वदा सबको प्राप्त ही है। परन्तु दृढ़ उद्देश्य न होने के कारण ऐसे नित्यप्राप्त तत्त्व की अनुभूति में देरी हो रही है।*
*यदि एक दृढ़ उद्देश्य बन जाय तो तत्त्व की अनुभूति में देरी का काम नहीं है। वास्तव में उद्देश्य पहले से ही बना बनाया है क्योंकि परमात्म प्राप्ति के लिये ही यह मनुष्य शरीर मिला है।*
*केवल इस उद्देश्य को पहचानना है।*
*जब साधक इस उद्देश्य को पहचान लेता है तब उसमें परमात्म प्राप्ति की लालसा उत्पन्न हो जाती है।*
*यह लालसा संसार की सब कामनाओं को मिटाकर साधक को परमात्मतत्त्व का अनुभव करा देती है।*
*अतः परमात्मप्राप्ति के उद्देश्य को पहचानने के लिये ही यहाँ*
*मोक्षपरायणः*
पद का प्रयोग हुआ है।
*कर्मयोग सांख्ययोग ध्यानयोग भक्तियोग आदि सभी साधनों में एक दृढ़ निश्चय या उद्देश्य की बड़ी आवश्यकता है।*
*अगर अपने कल्याण का उद्देश्य ही दृढ़ नहीं होगा तो साधन से सिद्धि कैसे मिलेगी इसलिये यहाँ*
*मोक्षपरायणः*
पद से ध्यानयोग में दृढ़ निश्चय की आवश्यकता बतायी गयी है।
*विगतेच्छाभयक्रोधो यः*
अपनी इच्छाकी पूर्तिमें बाधा देनेवाले प्राणीको अपने से सबल माननेपर उससे भय होता है कि निर्बल मानने से उस पर क्रोध आता है।
*ऐसे ही जीने की इच्छा रहने पर मृत्यु से भय होता है और दूसरों से अपनी इच्छापूर्ति करवाने तथा दूसरों पर अपना अधिकार जमाने की इच्छा से क्रोध होता है। अतः भय और क्रोध होने में इच्छा ही मुख्य है। यदि मनुष्य में इच्छा पूर्ति का उद्देश्य न रहे प्रत्युत एकमात्र परमात्मप्राप्ति का उद्देश्य रह जाय तो भयक्रोध सहित इच्छा का सर्वथा अभाव हो जाता है। इच्छा का सर्वथा अभाव होने पर मनुष्य मुक्त हो जाता है। कारण कि वस्तुओं की और जीने की इच्छा से ही मनुष्य जन्ममरण रूप बन्धन में पड़ताहै। साधक को गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये कि क्या वस्तुओं की इच्छा से वस्तुएँ मिल जाती हैं और क्या जीने की इच्छा से मृत्यु से बच जाते हैं वास्तविकता तो यह है कि न तो वस्तुओं की इच्छा पूरी कर सकते हैं और न मृत्यु से बच सकते हैं। इसलिये यदि साधक का यह दृढ़ निश्चय हो जाय कि मुझे एक परमात्मप्राप्ति के सिवाय कुछ नहीं चाहिये तो वह वर्तमान में ही मुक्त हो सकता है। परन्तु यदि वस्तुओं की और जीने की इच्छा रहेगी तो इच्छा कभी पूरी नहीं होगी और मृत्यु के भय से भी बचाव नहीं होगा तथा क्रोध से भी छुटकारा नहीं होगा।*
*इसलिये मुक्त होने के लिये इच्छारहित होना आवश्यक है।यदि वस्तु मिलने वाली है तो इच्छा किये बिना भी मिलेगी और यदि वस्तु नहीं मिलने वाली है तो इच्छा करने पर भी नहीं मिलेगी।*
*अतः वस्तु का मिलना या न मिलना इच्छा के अधीन नहीं है प्रत्युत किसी विधान के अधीन है। जो वस्तु इच्छा के अधीन नहीं है उसकी इच्छा को छोड़ने में क्या कठिनाई है यदि वस्तु की इच्छा पूरी होती हो तो उसे पूरी करने का प्रयत्न करते और यदि जीने की इच्छा पूरी होती हो तो मृत्यु से बचने का प्रयत्न करते।*
*परन्तु इच्छा के अनुसार न तो सब वस्तुएँ मिलती हैं और न मृत्यु से बचाव ही होता है। यदि वस्तुओं की इच्छा न रहे तो जीवन आनन्दमय हो जाता है और यदि जीने की इच्छा न रहे तो मृत्यु भी आनन्दमयी हो जाती है।*
*जीवन तभी कष्टमय होता है जब वस्तुओं की इच्छा करते हैं और मृत्यु तभी कष्टमयी होती है जब जीने की इच्छा करते हैं। इसलिये जिसने वस्तुओं की और जीने की इच्छा का सर्वथा त्याग कर दिया है वह जीते जी मुक्त हो जाता है अमर हो जाता है।*
*सदा मुक्त एव सः*
*उत्पत्ति विनाश शील पदार्थों के साथ अपना सम्बन्ध मानना ही बन्धन है।*
*इस माने हुए सम्बन्ध का सर्वथा त्याग करना ही मुक्ति है।*
*जो मुक्त हो गया है उस पर किसी भी घटना परिस्थिति निन्दास्तुति अनुकूलता प्रतिकूलता जीवनमरण आदि का किञ्चिन्मात्र भी असर नहीं पड़ता।*
*सदा मुक्त एव*
*पदों का तात्पर्य है कि वास्तव में साधक स्वरूप से सदा मुक्त ही है। केवल उत्पन्न और नष्ट होने वाली वस्तुओं से अपना सम्बन्ध माननेके कारण उसे अपने मुक्त स्वरूप का अनुभव नहीं हो रहा है। संसारसे माना हुआ सम्बन्ध मिटते ही स्वतःसिद्ध मुक्ति का अनुभव हो जाता है।*
*सम्बन्ध भगवान्ने योगनिष्ठा और सांख्यनिष्ठा का वर्णन करके दोनों के लिये उपयोगी ध्यानयोग का वर्णन किया। अब सुगमता पूर्वक कल्याण करने वाली भगवन्निष्ठा का वर्णन करते हैं।*
*इस संसार में निर्जीव व सजीव, चाहे वह चर हो अथवा अचर तथा केवल सजीव अथवा निर्जीव ही नहीं, सभी पञ्च भौतिक तत्व तक प्रत्येक किसी न किसी प्रकार से गतिमान बना हुआ है |*
*इस प्रकार गतिमान बने रहने को हम एक प्रकार की “यात्रा” करना कह सकते हैं |*
*यात्रा उसे कहते हैं, जहाँ सामने किसी न किसी प्रकार का एक लक्ष्य हो और उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए गतिमान होना आवश्यक है | बिना किसी लक्ष्य के यात्रा हो ही नहीं सकती |*
*मनुष्य के बारे में तो कहा जा सकता है कि वह कोई न कोई एक लक्ष्य स्वयं निर्धारित करता है और फिर उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यात्रा प्रारम्भ करता है परन्तु शेष चर-अचर जीवों तथा निर्जीव वस्तुओं का भला क्या लक्ष्य हो सकता है ?*
*इस प्रकार सोचना सही है | यह लक्ष्य किसी न किसी का तो निर्धारित किया हुआ है, जिस कारण से इस संसार में सभी सजीव, निर्जीव तथा पांच भौतिक तत्वों की यह यात्रा अनवरत चल रही है |*
*परमात्मा ने ब्रह्माण्ड को बनाया, चेतन-अचेतन को बनाया और अंततः उसने मनुष्य को बनाया |*
*परमात्मा को मानव बनाने की आवश्यकता क्यों हुई ?*
*केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जो सोच-समझ सकता है और अपना लक्ष्य निर्धारित कर सकता है | अतः कहा जा सकता है कि मनुष्य के द्वारा ही इस यात्रा का प्रारम्भ होता है और मनुष्य के द्वारा ही इस यात्रा का अंत हो सकता है |*
*मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना ही यही है कि वह अपने जीवन का लक्ष्य अभी तक सही प्रकार से निर्धारित नहीं कर सका है, तभी तो उसकी यात्रा कभी समाप्त नहीं हो पा रही है |*
*लक्ष्य एक ही हो सकता है, अनेक नहीं | अनेक तो कामनाएं हो सकती है |*
*हमें समझना होगा कि हमारे लिए यहाँ दो ही अनंत हैं, एक तो हमारी कामनाएं और दूसरा परमात्मा |*
*हम अनंत को तो पाना चाहते हैं परन्तु हमारा यह अनंत परमात्मा न होकर हमारी कामनाएं होती है | कामनाएं अनंत होती हैं और इस कारण से उनको कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता |*
*परमात्मा भी अनन्त है परन्तु उसे प्राप्त किया जा सकता है |*
*मानव जन्म पाकर हमारा लक्ष्य केवल कामनाओं को पूरा करना ही रह गया है,*
*परमात्मा को पाना नहीं रहा*
*यही हमारी जीवन यात्रा का पथ-विचलन है।*
*मनुष्य को यही सोचना और समझना होगा कि अनंत को पाने के लिए यात्रा को भी अनंत किया जाये अथवा अनंत को पाकर यात्रा का अंत कर दिया जाये |*
*अगर अनंत को पाने के लिए अनंत काल तक यात्रा करनी है तो संसार के भोग विलास की कामनाएं मन में उत्पन्न करते रहें और अगर अनंत को पाकर यात्रा समाप्त करनी है, तो परमात्मा को पाने की ही एक मात्र कामना करनी पडती है।*
Friday, 21 July 2017
मनुष्य ++++++
Swamishishuvidehanand Tiw: Swamishishuvidehanand Tiw: ता ,२१/७/२०१७/ दोपहर
१"५३-( १३'५३)
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपीठ ,संस्थापक अध्यक्ष
हम स्वामि शिशुविदेहानंद सरस्वती तिवारी महाराज ' अग्निहोत्रितिवारी'
तिवारी का बाडा
कारंजालाड (दत्त) 444105 जिला वाशिम महाराष्ट्र
माॅ मीराबाई ह तिवारी द्वारा आयोजित कार्यक्रम सव्वाकरोड मिट्टी के शिवलिंग निर्माण में विश्व के अनेकानेक व्यक्ति
ग्लोबल वार्मिंग एवं भूमंडलीय औष्णिकरण पर सन 1994/2005/ से कार्य अध्यात्मिक पद्धति से शुरू है
पहलाचरण एकतालिसलाख ग्यारह हजार पाचसौ का पुर्ण हो चूका,
अब
दुसराचरण एकसष्टलाख ग्यारहहजार मिट्टि के शिवलिंग निर्माण का शुरू है ,
।। अथातों वृक्षसंवर्धन जिद्न्यासा।।
एकसठलाख ग्यारहहजार शिवलिंगम् का अभिषेकम् पुजनम्
दुसराचरण पूर्ण हो गया है।
माँ
मीराबाई ह तिवारि द्वारा
आयोजित कार्यक्रम सव्वासौकरोड मिट्टी के शिवलिंगम् निर्माण
एकसष्ठ लाख ग्यारहहजार नौ सौ (६१०००००"११हजार नौ सौ )
।। अथातों वैदिक वृक्ष जिद्न्यासा ।।
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपिठ, संस्थापक अध्यक्ष स्वामिशिशुविदेहानन्द'स्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज कारंजालाड(दत्त)४४४१०५ जिला वाशिम के
माँ मिराबाई हरीकिसन तिवारि के मार्गदर्शन में ,
शक्तीपिठ में सब वृक्षसंवर्धन के कार्य होते है।
।। अथातों वृक्षसंवर्धन जिद्न्यासा ।।
।। अथातों भक्त जिद्न्यासा ।।
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपिठ ,संस्थापक अध्यक्ष स्वामिशिशुविदेहानन्दस्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज , के तत्वावधान में
विशाल
पौधरोपण एवं
षोषखड्डा = रेनवाटर हार्वेस्टिंग , ,ओर प्रीय मित्रों, अनुयायियों ,और सदस्यों को हम
स्वामिशिशुविदेहानन्दस्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज
आवाहन करते है ..
शिवलिंगम् निर्माण में शामिल हुए।
Swamishishuvidehanand TiwariMaharaJ
SwamishishuvidehanandSwamishishusatyaVidehanand Sarswati
09921700260/09503857973
।। अथातों भक्त जिद्न्यासा।।
*मनुर्भव (मनुष्य बनो)*
वेद कहता है कि तू मनुष्य बन।जब कोई जैसा बन जाता है तो वैसा ही दूसरे को बना सकता है।जलता हुआ दीपक ही बुझे हुए दीपक को जला सकता है।
बुझा हुआ दीपक भला बुझे हुए दीपक को क्या जलाएगा?मनुष्य का कर्त्तव्य है कि स्वयं मनुष्य बने और दूसरों को मनुष्यत्व की प्रेरणा दे।स्वयं अच्छा बने और दूसरों को अच्छा बनाए।यदि मनुष्य स्वयं तो अच्छा बनता है, परन्तु दूसरों को अच्छा नहीं बनाता तो उसकी साधना अधूरी हो जाती है।यदि स्वयं तो अच्छा है, परन्तु अपनी सन्तान को अच्छा नहीं बनाता तो वह अपने लक्ष्य में आधा सफल होता है।
वास्तव में मानव की मानवता ही उसका आभूषण है।वेद, मनुष्य को उपदेश देता है कि तू मनुष्य बन।कोई कहता है मुसलमान बन, कोई कहता है तू ईसाई बन।कोई कहता है तू बौद्ध बन, परन्तु वेद कहता है तू मनुष्य बन।यह और इस जैसी विशेषताएँ वेद के आसन को अन्य धर्मग्रन्थों के आसन से बहुत ऊँचा उठा देती है।वेद का उपदेश संकीर्णता और संकुचितता से परे है।वेद का उपदेश सभी स्थानों, सभी कालों और सभी मनुष्यों पर समान रुप से लागू होता है।.
जब संसार में यह वेदोपदेश चरितार्थ था तब संसार में मानव वस्तुतः मानव था।मानवता का भेद करने वाले कारण उपस्थित नहीं थे।
संसार में जितने जलचर, नभचर और भूचर प्राणी हैं, उनमें से सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य की शरीर–रचना, अन्य प्राणियों से अति श्रेष्ठ है।उसे बुद्धि से विभूषित करके परमात्मा ने चार चाँद लगा दिये।
शतपथ ब्राह्मणकार ने बहुत ही सुन्दर कहा है―
*पुरुषो वै प्रजापतेर्नेदिष्ठम्।*
*अर्थात्―*प्राणियों में से मनुष्य परमेश्वर के निकटतम है।अन्य कोई प्राणी परमेश्वर की इतनी निकटता को प्राप्त किये हुए नहीं है जितनी कि मनुष्य।
यदि मानव अपनी मानवता को पहचानता रहे तो वह मनुष्य है, अन्यथा उसमें पशुत्व उभरकर उसे पशु बना देता है।
संस्कृत मे स्वामिशिशुविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज ने कहा है :--
खादते मोदते नित्यं शुनकः शूकरः खरः।
तेषामेषां को विशेषो वृत्तिर्येषां तु तादृशी।।
_कुत्ते, सूअर और गधे आदि भी खाते–पीते और खेलते–कूदते हैं।यदि मनुष्य भी केवल इन्हीं बातों से अपने जीवन की सार्थकता मानता है तो फिर उसमें और पशु में अन्तर ही क्या है?_
कवि तो केवल खाने–पीने और खेलने–कूदने तक ही कहकर रह गया, परन्तु ऐसे भी मनुष्य हैं जिनमें और पशुओं में कोई अन्तर नहीं है।मूर्खता में कई व्यक्ति गधे के समान होते हैं।बस्तियाँ उजाड़ने वाले मनुष्य उल्लुओं से भी अधिक भयंकर होते हैं।कड़वी और तीखी बातें कहनेवाले ततैयों से भी अधिक पीड़क होते हैं।
व्यसनी व्यक्ति जो दूसरों को भयंकर व्यसनों का शिकार बना लेते हैं, साँपों और बिच्छुओं से भी अधिक भयंकर होते हैं, क्योंकि उनके व्यसन व्यक्ति को जीवन–पर्यन्त पीड़ित करते रहते हैं।
क्रोधी और निर्बलों को दबाने वाले व्यक्ति भेड़िये के समान होते हैं।परस्पर लड़नेवालों में कुत्ते की मनोवृत्ति पाई जाती है।
अभिमानी व्यक्तियों में गरुड़ की मनोवृत्ति प्रधान है।लोभी व्यक्ति गीध के समान होते हैं।शब्द–रस में फँसे हुए प्राणी हिरण के समान, स्पर्श–सुख के वशीभूत मनुष्य हाथी के समान, रुपरस के शिकार मनुष्य पतंगे के समान, गन्धरस के शिकार भँवरे के समान, स्वाद के वशीभूत प्राणी मछली के समान होते हैं।कायर व्यक्ति को भेड़ और गीदड़ की उपमा दी जाती है।हरिचुग व्यक्तियों को गिरगिट के तुल्य ठहराया जाता है।
ये पशुवृत्तियाँ केवल अपठित और अर्द्धशिक्षित व्यक्तियों में ही नहीं पायी जातीं, अपितु पढ़े–लिखे और शिक्षित–प्रशिक्षित भी इनका शिकार हैं।बी० ए०, एम० ए० भी ईर्ष्या और द्वेष की दलदल में फँसे हुए हैं।
शास्त्री और आचार्य भी संकीर्णता और संकुचितता के रोगों से ग्रसित हैं।पढ़े–लिखे भी दूसरों को धोखा देते हैं।
वे भी छल–कपट करते हुए झिझकते नहीं हैं।शिक्षा भूषण के स्थान पर दूषण बन गई है।मनुष्य, शिक्षा प्राप्त करने से ही मनुष्य बन जाए, यह कोई आवश्यक नहीं है।
मनुष्यत्व तो एक साधना है।यह कुछ वर्षों की साधना नहीं, अपितु जीवनभर की साधना है।मनुष्यत्व की प्राप्ति के लिए मनुष्य को जागरुक रहना पड़ता है, आत्मनिरीक्षण करना पड़ता है।
तभी मनुष्य मनुष्यत्व का अधिकारी बनता है।ऊँचे मनुष्यों का संसार में मिलना बहुत कठिन है
*ईश्वर तो मिलता है इंसान ही नहीं मिलता,
*ये चीज वह है कि देखी कहीं कहीं मैंने।
१"५३-( १३'५३)
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपीठ ,संस्थापक अध्यक्ष
हम स्वामि शिशुविदेहानंद सरस्वती तिवारी महाराज ' अग्निहोत्रितिवारी'
तिवारी का बाडा
कारंजालाड (दत्त) 444105 जिला वाशिम महाराष्ट्र
माॅ मीराबाई ह तिवारी द्वारा आयोजित कार्यक्रम सव्वाकरोड मिट्टी के शिवलिंग निर्माण में विश्व के अनेकानेक व्यक्ति
ग्लोबल वार्मिंग एवं भूमंडलीय औष्णिकरण पर सन 1994/2005/ से कार्य अध्यात्मिक पद्धति से शुरू है
पहलाचरण एकतालिसलाख ग्यारह हजार पाचसौ का पुर्ण हो चूका,
अब
दुसराचरण एकसष्टलाख ग्यारहहजार मिट्टि के शिवलिंग निर्माण का शुरू है ,
।। अथातों वृक्षसंवर्धन जिद्न्यासा।।
एकसठलाख ग्यारहहजार शिवलिंगम् का अभिषेकम् पुजनम्
दुसराचरण पूर्ण हो गया है।
माँ
मीराबाई ह तिवारि द्वारा
आयोजित कार्यक्रम सव्वासौकरोड मिट्टी के शिवलिंगम् निर्माण
एकसष्ठ लाख ग्यारहहजार नौ सौ (६१०००००"११हजार नौ सौ )
।। अथातों वैदिक वृक्ष जिद्न्यासा ।।
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपिठ, संस्थापक अध्यक्ष स्वामिशिशुविदेहानन्द'स्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज कारंजालाड(दत्त)४४४१०५ जिला वाशिम के
माँ मिराबाई हरीकिसन तिवारि के मार्गदर्शन में ,
शक्तीपिठ में सब वृक्षसंवर्धन के कार्य होते है।
।। अथातों वृक्षसंवर्धन जिद्न्यासा ।।
।। अथातों भक्त जिद्न्यासा ।।
श्रिदुर्गारक्ताम्बरा शक्तिपिठ ,संस्थापक अध्यक्ष स्वामिशिशुविदेहानन्दस्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज , के तत्वावधान में
विशाल
पौधरोपण एवं
षोषखड्डा = रेनवाटर हार्वेस्टिंग , ,ओर प्रीय मित्रों, अनुयायियों ,और सदस्यों को हम
स्वामिशिशुविदेहानन्दस्वामिशिशुसत्यविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज
आवाहन करते है ..
शिवलिंगम् निर्माण में शामिल हुए।
Swamishishuvidehanand TiwariMaharaJ
SwamishishuvidehanandSwamishishusatyaVidehanand Sarswati
09921700260/09503857973
।। अथातों भक्त जिद्न्यासा।।
*मनुर्भव (मनुष्य बनो)*
वेद कहता है कि तू मनुष्य बन।जब कोई जैसा बन जाता है तो वैसा ही दूसरे को बना सकता है।जलता हुआ दीपक ही बुझे हुए दीपक को जला सकता है।
बुझा हुआ दीपक भला बुझे हुए दीपक को क्या जलाएगा?मनुष्य का कर्त्तव्य है कि स्वयं मनुष्य बने और दूसरों को मनुष्यत्व की प्रेरणा दे।स्वयं अच्छा बने और दूसरों को अच्छा बनाए।यदि मनुष्य स्वयं तो अच्छा बनता है, परन्तु दूसरों को अच्छा नहीं बनाता तो उसकी साधना अधूरी हो जाती है।यदि स्वयं तो अच्छा है, परन्तु अपनी सन्तान को अच्छा नहीं बनाता तो वह अपने लक्ष्य में आधा सफल होता है।
वास्तव में मानव की मानवता ही उसका आभूषण है।वेद, मनुष्य को उपदेश देता है कि तू मनुष्य बन।कोई कहता है मुसलमान बन, कोई कहता है तू ईसाई बन।कोई कहता है तू बौद्ध बन, परन्तु वेद कहता है तू मनुष्य बन।यह और इस जैसी विशेषताएँ वेद के आसन को अन्य धर्मग्रन्थों के आसन से बहुत ऊँचा उठा देती है।वेद का उपदेश संकीर्णता और संकुचितता से परे है।वेद का उपदेश सभी स्थानों, सभी कालों और सभी मनुष्यों पर समान रुप से लागू होता है।.
जब संसार में यह वेदोपदेश चरितार्थ था तब संसार में मानव वस्तुतः मानव था।मानवता का भेद करने वाले कारण उपस्थित नहीं थे।
संसार में जितने जलचर, नभचर और भूचर प्राणी हैं, उनमें से सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य की शरीर–रचना, अन्य प्राणियों से अति श्रेष्ठ है।उसे बुद्धि से विभूषित करके परमात्मा ने चार चाँद लगा दिये।
शतपथ ब्राह्मणकार ने बहुत ही सुन्दर कहा है―
*पुरुषो वै प्रजापतेर्नेदिष्ठम्।*
*अर्थात्―*प्राणियों में से मनुष्य परमेश्वर के निकटतम है।अन्य कोई प्राणी परमेश्वर की इतनी निकटता को प्राप्त किये हुए नहीं है जितनी कि मनुष्य।
यदि मानव अपनी मानवता को पहचानता रहे तो वह मनुष्य है, अन्यथा उसमें पशुत्व उभरकर उसे पशु बना देता है।
संस्कृत मे स्वामिशिशुविदेहानन्द सरस्वति तिवारीमहाराज ने कहा है :--
खादते मोदते नित्यं शुनकः शूकरः खरः।
तेषामेषां को विशेषो वृत्तिर्येषां तु तादृशी।।
_कुत्ते, सूअर और गधे आदि भी खाते–पीते और खेलते–कूदते हैं।यदि मनुष्य भी केवल इन्हीं बातों से अपने जीवन की सार्थकता मानता है तो फिर उसमें और पशु में अन्तर ही क्या है?_
कवि तो केवल खाने–पीने और खेलने–कूदने तक ही कहकर रह गया, परन्तु ऐसे भी मनुष्य हैं जिनमें और पशुओं में कोई अन्तर नहीं है।मूर्खता में कई व्यक्ति गधे के समान होते हैं।बस्तियाँ उजाड़ने वाले मनुष्य उल्लुओं से भी अधिक भयंकर होते हैं।कड़वी और तीखी बातें कहनेवाले ततैयों से भी अधिक पीड़क होते हैं।
व्यसनी व्यक्ति जो दूसरों को भयंकर व्यसनों का शिकार बना लेते हैं, साँपों और बिच्छुओं से भी अधिक भयंकर होते हैं, क्योंकि उनके व्यसन व्यक्ति को जीवन–पर्यन्त पीड़ित करते रहते हैं।
क्रोधी और निर्बलों को दबाने वाले व्यक्ति भेड़िये के समान होते हैं।परस्पर लड़नेवालों में कुत्ते की मनोवृत्ति पाई जाती है।
अभिमानी व्यक्तियों में गरुड़ की मनोवृत्ति प्रधान है।लोभी व्यक्ति गीध के समान होते हैं।शब्द–रस में फँसे हुए प्राणी हिरण के समान, स्पर्श–सुख के वशीभूत मनुष्य हाथी के समान, रुपरस के शिकार मनुष्य पतंगे के समान, गन्धरस के शिकार भँवरे के समान, स्वाद के वशीभूत प्राणी मछली के समान होते हैं।कायर व्यक्ति को भेड़ और गीदड़ की उपमा दी जाती है।हरिचुग व्यक्तियों को गिरगिट के तुल्य ठहराया जाता है।
ये पशुवृत्तियाँ केवल अपठित और अर्द्धशिक्षित व्यक्तियों में ही नहीं पायी जातीं, अपितु पढ़े–लिखे और शिक्षित–प्रशिक्षित भी इनका शिकार हैं।बी० ए०, एम० ए० भी ईर्ष्या और द्वेष की दलदल में फँसे हुए हैं।
शास्त्री और आचार्य भी संकीर्णता और संकुचितता के रोगों से ग्रसित हैं।पढ़े–लिखे भी दूसरों को धोखा देते हैं।
वे भी छल–कपट करते हुए झिझकते नहीं हैं।शिक्षा भूषण के स्थान पर दूषण बन गई है।मनुष्य, शिक्षा प्राप्त करने से ही मनुष्य बन जाए, यह कोई आवश्यक नहीं है।
मनुष्यत्व तो एक साधना है।यह कुछ वर्षों की साधना नहीं, अपितु जीवनभर की साधना है।मनुष्यत्व की प्राप्ति के लिए मनुष्य को जागरुक रहना पड़ता है, आत्मनिरीक्षण करना पड़ता है।
तभी मनुष्य मनुष्यत्व का अधिकारी बनता है।ऊँचे मनुष्यों का संसार में मिलना बहुत कठिन है
*ईश्वर तो मिलता है इंसान ही नहीं मिलता,
*ये चीज वह है कि देखी कहीं कहीं मैंने।
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